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अब गर्व नही सवाल करेंगे हम,पूरा देश जगा रहा पूरी रात,उठ रही आवाज जवाब दो सरकार ।

राघव मिश्रा/अमूमन देर से सोता हूँ पर कल जल्दी सोना चाहता था कि नींद आ जाए तो दिमाग में भरा यह गुस्सा थोड़ा कम हो, पर पूरी रात नींद नही आई आंसू अपने आप निकल रहे थे और मैं उसे बहने नही देना चाह रहा था रोकने का प्रयास सिर्फ इसलिए कर रहा था कि ये गुस्सा हमेसा ताजा रहे ,मामूली आदमी हूँ। मेरे गुस्से का क्या मोल? बस एक वोट! या जो थोड़ा-बहुत लिखता हूँ तो चार लोग सुन लेते हैं, बस इतना ही न। पर जो मामूली नहीं हैं, उन्हें भी क्या इतना ही क्रोध आ रहा होगा? क्या कहीं वे कुछ लोग जो नीतियां, रणनीतियां बनाते हैं, इस समय किसी कमरे में सिर जोड़े कोई योजना बना रहे होंगे?

क्या होगी योजना? उरी के प्रतिशोध की तरह फिर से कोई सर्जिकल स्ट्राइक! पर क्या ऐसे स्ट्राइक अधिक समय तक कारगर हैं? नहीं हैं! होते तो आज यह कांड नहीं होता। हालांकि सर्जिकल स्ट्राइक भी हम कछुआ प्रजाति के सुस्त और भुलक्कड़ नागरिकों के लिए बहुत बड़ी बात थी, पहली बार जो थी। पर यह अंतिम उपाय तो नहीं हो सकता, कि वे दस मारें तो हम बीस मार दें, फिर वे तीस मारे तो हम चालीस को निपटा दें।

इनका समूल नाश करना चाहिए। अन्य कोई उपाय नहीं। रणनीति बनाने वालों को हम मामूली लोग क्या सुझाव दे सकते हैं, पर इतना तो कहेंगे ही कि जो करो, अंतिम करो। ऐसा करो कि कोई कसर न रहे। उन्हें साक्षात नरक के दर्शन करवा दो।
और हां शहादत पर गर्व करना बंद करिए. सवाल करिए. प्लीज़ सवालों की जगह गर्व करना एकदम बन्द करिए. यह गंदा है. लाइफ़ में आपने जिस भी स्थिति पर गर्व किया होगा, उसे बार बार लाना चाहते होंगे. आपका लड़का फर्स्ट आया होगा तो आपको उसपर गर्व हुआ होगा, आप चाहते होंगे वो फ़र्स्ट बार बार आए. आपने घर खरीदा होगा तो प्राउड फ़ील किया होगा. आप इसे भी दोहराना चाहते होंगे. यह ऐसे ही काम करता है. क्या आप इस शहादत वाले गर्व को बार बार दोहरवाना चाहेंगे ? नहीं. क्या आपने ऐसी किसी स्थिति का सामना कभी और किया है जहाँ ‘न चाहते हुए भी गर्व करना पड़े’ ? नहीं. इसलिए बन्द करिए ये. यहाँ गर्व नहीं, सवाल होने चाहिए.

दूसरी बात ये भी, कि आप ऐसी शहादत पर कैसे गर्व कर सकते हैं जिसमें शहीद होने वाला अपना पराक्रम दिखा ही न पाया हो ? क्या किसी पहलवान को कोई सनकी पीछे से छुरी मार दे तो आप उस पहलवान की पहलवानी का जश्न मनाएँगे ? क्या लॉजिक है ये ? अगर वो सनकी आदमी उस पहलवान से सामने से लड़ा होता तो जीत पाता? नहीं. क्या अगर ये घोषित युद्ध होता तो वो 10-15 बोक्के हमारे जवानों को मार पाते ? नहीं. यह मुँहचोरी थी, जो गर्व करने से उनकी ही सीनाज़ोरी जैसी दिखेगी. मत करिए ये. यह युद्ध नहीं था. वो लड़कर नहीं हारे. वो सनकियों का शिकार हुए हैं. ठीक वैसे जैसे दुनिया के किसी भी कोने में ‘अघोषित’ आतंकवाद करता है. यहाँ गर्व न करिए.

आप शहीदों के घर गर्व लेकर किस मुँह से जाएँगे ? क्या कहेंगे कि हमें गर्व है कि आपके पिता शहीद हुए ? हमें गर्व है कि वो अब नहीं लौटेंगे ? हमें गर्व है कि अब वो राखी नहीं बंधवा पाएँगे? कितना घटिया है ये. बन्द करिए ये. गर्व करना बिल्कुल बन्द करिए. सवाल करिए. सवाल क्या करना है ये बहुत ही सिम्पल है. एक एक मौत को एक एक मौत की तरह देखिए. एक एक परिवार का उजड़ना महसूस करिए. यह कोई चुनाव नहीं जहाँ ‘पिछली बार से ज़्यादा सीटें आ गईं हैं तो कोई पार्टी बड़ी हो गई है. पिछली बार से ज़्यादा शहादतें हुईं हैं तो पिछले बार से ज़्यादा बड़ा हमला हुआ ये’. ये भी घटियापना है. कोई एक भी शहादत होती है तो आप उस एक के घर की सोचिए. आपको वो भी भारी लगेगा. बड़ा हमला छोटा हमला वाली हेडलाइन बन्द करिए. प्लीज़.

यह हमला पॉलिटिकल फेल्योर है. यह इंटेलीजेंस फेल्योर है. यह हमारी ताक़त का फेल्योर है. नीतियों का फेल्योर है. इन फेल होते अटेंप्ट्स का ज़बाब माँगिए. कस के पूछिए. उलझ जाइए. सरकारों को हाँफ जाने दीजिए. बोलिए कि हमें गर्व नहीं बल्कि दुःख हो रहा है. गर्व और दुःख एकसाथ नहीं हो सकते. गर्व के साथ तो खुशी आती है. यह कैसा गर्व. इससे बाहर निकलिए. आपका शहादत पर गर्व करना इन नेताओं का पॉलिटिकल शिल्डिंग बन गया है. तत्काल जब आपको उनकी नीतियों पर सवाल पूछकर उनकी हालत ख़राब करनी चाहिए तो आप गर्व कर रहे होते हैं. न करिए ये. उनसे पूछिए कि हमारे किसी जवान की महानता केवल शहीद होने में क्यों है ? बिना युद्ध के वो शहीद आख़िर क्यों हुआ ? किसकी ग़लती से हुआ ये ? कौन है वो ज़िम्मेदार ? कौन कौन फेल हुआ ?

‘शहीदों की चिंताओं पर लगेंगे हर बरस मेले’ सबसे बुरी कविता है. शहीदों की चिंताओं पर मेले नहीँ, जुलूस निकलने चाहिए. हमारे जवानों की जाती जानों के सवालों की बौछारों का शक्तिशाली जुलूस. हमारे उन जवानों ने किसी कायर के हाथों शहीद होना नहीं सोचा था. वो लड़ते लड़ते मर जाने के सपने भले ही देख लेते होंगे. अपने तमाम सिस्टम के फेलियर को उन जवानों की शहादत पर अपना अनचाहा गर्व मत थोपिए. उनको कटघरे में ले आइए. प्लीज़ सवाल करिए. गर्व मत करिए.

हमेशा से पढ़ते आया हूँ, भारत एक शांतिप्रिय देश है। इतिहास कहता है कि कभी भारत ने किसी देश पर कोई आक्रमण नहीं किया। यहाँ तक कि जब गुलामी से लड़ने का वक़्त था तब अहिंसा को भी यहाँ एक हथियार की तरह प्रयुक्त किया गया। आज़ादी अहिंसा से मिली या अन्य कारकों से वो अलग विषय है, पर हमारा यही इतिहास बार बार इस बात की पुष्टि करता आया है कि हमारी इस अहिंसक नीति को हमारी कमजोरी माना गया है। एक के बाद एक कितने युद्ध थोपे गए, हम प्रतिकार करते हैं पर हमेशा बाद में।

आतंक से लड़ने की हमारी नीति भी इससे कुछ भिन्न नहीं, कोई आतंकी हमला होता है, सैकड़ों-हजारों निर्दोष लोग मारे जाते हैं, बयानवीर बयान देते हैं, कड़ी निंदा करते हैं, केस चलने लगते हैं, बड़े देशों के सामने दुहाई दी जाती है कि देखो हमारे लोग मार दिए, आप इसे समझाते क्यों नहीं। बड़े देश अपनी सुविधा से कुछ झुनझुना बजाते हैं और हम उसी रुनझुन को अपनी उपलब्धियों में शुमार कर लेते हैं। ये प्रक्रिया जाने कितनी बार दोहराते देख कोफ्त होने लगी थी। मोदी सरकार ने जब उरी के बाद सर्जिकल स्ट्राइक की तो लगा अब शायद इन घटनाओं का चलन रुकेगा। लेकिन पुलवामा की घटना उसी सर्जिकल स्ट्राइक को मुँह चिढाती मालूम होती है कि तुम वो करोगे तो हम ये करेंगे।

बिना लोकल सपोर्ट के इतनी बड़ी घटना को अंजाम देना नामुमकिन है। सोशल मीडिया पर इसे वेलेंटाइन डे का गिफ्ट कहने वाले, पटाखे फोड़ कर खुशी का इजहार करने वाले, सैनिकों की शहादत पर दांत दिखा कर आज़ादी आज़ादी चिल्लाते लोग भले ही खुद को कश्मीरी कहें पर इस देश के तो कतई नहीं हैं मोदी जी, ये लोग कम्प्यूटर भी चलाएंगे तो देश के खिलाफ जहर उगलने के लिए। ऐसे हर द्रोही को जीवन से आज़ादी देने का वक़्त आ चुका है। क्यों देशवासियों के सब्र की परीक्षा लेते हो ? हमारी सेनाएँ समर्थ हैं, उन्हें फ्री हैंड दीजिए ताकि हर सांप और उसके हिमायती को बिल से खोद कर नरक में भेजा जा सके।

पूरा देश जाग रहा है मोदी जी, आप भी जागिए प्लीज।
आज कुछ घरों में खाना नहीं बना होगा । और कुछ में बन भी गया होगा तो खाया नहीं गया होगा । कुछ के आँसू रुकेंगें नहीं और जिनके रूकेंगे उनके फिर कभी किसी बात पर बहेंगे नहीं । जीते – जागते लोग, जिस आँगन में खेले, उसी आँगन की दीवारों पर तस्वीर बन गए ।

अभी कुछ दिन पहले बजट में रक्षा बजट की वृद्धि पर कुछ लोग मज़ाक़ उड़ा रहे थे । पर जिस देश में इतिहास किसी चंपक कहानी की तरह लिखा गया है उस देश के वासियों को विजयनगर साम्राज्य के हश्र से कोई शिक्षा कैसे मिल सकती है । विजयनगर साम्राज्य इतना समृद्ध था कि वहाँ की मण्डी में उस समय में विश्व में बनायी गयी हर सामग्री मिल जाती थी । और बोला जाता है कि हीरे जवाहरत, सब्ज़ी की तरह मण्डी में सजाए जाते थे । पर हुआ क्या, एक दिन अनपढ़ और जाहिल नबावों ने मिलकर आक्रमण करके उसको मिट्टी में मिला दिया । कभी समय मिले तो हम्पी जाकर ज़रूर देखना, समझ में आएगा कि रक्षा बजट कितना आवश्यक है ।

कोई भी देश तभी शक्तिशाली बनता है जब वह अपने एक-एक नागरिक के जीवन का मोल अतुल्य मानकर निर्णय लेता है । देश, काल की तरह हमेशा रहेगा और इसलिए इसे जताना होगा कि मुझे भेदकर चले जाना इतना आसान नहीं है । अगर कल आने वाली पीढ़ी को निर्भय जीवन देना है तो आज, देश के दुश्मनों को पाठ पढ़ाने की आवश्यकता है ।मुझे पूरा विश्वास है कि ये बलिदान निरर्थक नहीं जाएगा ।

इन मार्मिक क्षणों में हर देश वासी की तरह मैं उन बहादुर जवानों के परिवार के साथ हूँ । भारत माँ के दिवंगत सपूतों को मेरा नमन है । ॐ शांति ।

About मैं हूँ गोड्डा

MAIHUGODDA The channel is an emerging news channel in the Godda district with its large viewership with factual news on social media. This channel is run by a team staffed by several reporters. The founder of this channel There is Raghav Mishra who has established this channel in his district. The aim of the channel is to become the voice of the people of Godda district, which has been raised from bottom to top. maihugodda.com is a next generation multi-style content, multimedia and multi-platform digital media venture. Its twin objectives are to reimagine journalism and disrupt news stereotypes. It currently mass follwer in Santhal Pargana Jharkhand aria and Godda Dist. Its about Knowledge, not Information; Process, not Product. Its new-age journalism.

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