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नाबालिक से बालिक हो गया अनाथ मोहन ,नही लिया विभाग ने संज्ञान

अमिताभ बच्चन की फ़िल्म ‘लावारिस’ का गाना था. ‘जिसका कोई नहीं, उसका तो ख़ुदा है यारों’. ये बच्चे भी ख़ुदा के ही हवाले हैं. भाजपा सरकार ने अमरत्व प्राप्त करने के लिए राम मंदिर और राफ़ेल को चुना. क्या हेमंत साहब का यश अनाथ बच्चों के लिए कोई मुकम्मल राह निकलवा कर अमरता को हासिल होगा?

राघव मिश्रा/मोहन अपने आगे रखे निवाले को निहारता है ,कभी हाथ से उठाकर खाना चाहता है लेकिन मोहन को एक गंभीर बिमारी होने के कारण ये सब सोचकर भी वो नही कर पाता ! यह कहानी सूबे के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विधानसभा क्षेत्र की है जहाँ मोहन के साथ उसकी दो बहन प्रमिला बासकी और शांति बासकी है ,जिला मुख्यालय से तकरीबन 20 किलोमीटर की दुरी पर सुंदरपहाड़ी प्रखंड का सुंदरमोर गाँव जहां मोहन के साथ उसकी दो बहन अनाथ है ,जब हम इन बच्चों के घर पर पहुंचे तो गाय बाँधने वाले घर (गोहाल)में एक चटाई पर हिलते डुलते मोहन को पाया ,मोहन के सामने एक सखुए के पत्ते भात और कुछ सुखी सब्जी रखी हुई थी मोहन अपने सामने रखे निवाले को खाना चाहता था ,लेकिन मानसिक विक्षिप्तता और गंभीर बिमारी ने उसे ऐसे जकड़ रखा है जिसके कारण वो सामने रखे निवाले को निहारता है खाने का प्रयास करता है लेकिन बिमारी के कारण कांपते हाथों को भोजन की तरफ बढाते ही अचानक हाथ झटक जाता है जिससे सामने रखे पत्ते पर उसका भोजन बिखर जाता है .

अनाथ भाई को बहन का ही सहारा

दिव्यांग मोहन को संभालती दोनों बहने ,प्रमिला और शांति

यह देख तुरंत उसकी बहन शांति आती है और सब्जी भात को मिलाकर अपने हाथों से भाई मोहन के मुह में निवाला डालती है ,मोहन खाने लगता है ,उसी गोहाल में रखे एक चाइना वाला आई पौड में बहन प्रमिला गाना बजाने का प्रयास करती है लेकिन मोहन के कांपते हाथों से ठोकर लगकर वो खराब हो चुका होता है ,दोनों बहने मिलकर मोहन को भोजन कराती है ,मोहन को स्नान कराती है , काँधे में हाथ रखकर दोनों बहने मोहन को घर से दूर शौचालय के लिए जाती है .इन कामों के अलावे दोनों बहने जंगल से लकड़ी काटकर लाती ,चाची के घर पर काम भी करती और इन सबके बिच अपने स्कुल खुलने का इंतिजार भी करती .

मां के मरने के बाद नही खोला था किसी ने दरवाजा

जिस गोहाल में मोहन रह रहा है उसके बगल में ही मोहन का अपना जमीन भी है ढहे हुए ढाँचे में ईंटो की चंद टुकड़ी यह बता रहा है की दशकों पहले यहाँ घर हुआ करता था ,जब हमने शांति से उसकी पूरी जीवनी के बारे में पूछा तो इस विकास वाली सिस्टम पर शर्म आ गया ,शांति कपसते हुए बोली की हम तीनो भाई बहन यहीं घर रहते थे, पिताजी गुजरने का तो हमे याद नही लेकिन मां जिस रात गुजर गई थी वो मुझे पूरी तरह याद है चूँकि हमने उस वक्त होश संभाल ली थी ,शांति आगे रोते हुए बताती है की मां का देहांत रात में हुआ था और मरने के बाद जब प्रमिला दीदी हमको लेकर दुसरे के घर मदद के लिए गई थी तो किसी ने दरवाजा नही खोला था और यह कहकर शांति फिर से रो पड़ती है .

लड़खड़ाते मोहन को संभालती बहन शांति

कानून पेंच के बिच फंस गया तीनो भाई बहन की खुशहाल जिंदगी

इसी बिच प्रमिला कहती है की जब हम लोग अनाथ हो गये तो किसी ने हमारी जानकारी स्वामी विवेकानंद अनाथ आश्रम में दिया की उस गाँव में तीन अनाथ बच्चे हैं ,तब जाकर हम सभी भाई बहनों को बंदना दीदी यहाँ से आश्रम ले गई ,हमसभी को दीदी ने इतना प्यार दिया की लगा ही नही की हम अनाथ हैं ,हम दोनों बहनों का एडमिशन कस्तूरबा स्कुल में कर दिया गया हमलोग पढाई करने लगे ,छुट्टी में भी बंदना दीदी के पास आते थे जहाँ भाई भी रहता था सब मिलजुलकर ख़ुशी ख़ुशी रहते थे लेकिन लॉकडाउन के बाद जब स्कुल होस्टल बंद हो गया तो हमे घर आना पड़ा जहाँ जमीन तो है लेकिन घर नही भाई की स्थिति ऐसी है जो हमेसा हिलते रहता है,बहुत ही कष्ट हो गया है ,भाई को शौचालय ले जाना ,खाना खिलाना यहाँ तक की उसके हरेक काम को हमी बहनों को करना पड़ता है ,अचानक शांति कहती है की घर शौचालय और राशन अगर मिलने लगे तो हम अपने भाई को लेकर रह सकते हैं कबतक हमे चाची के घर रखेगी हमारा अपना भी तो घर हो .इन तमाम कष्टों के बिच अपनी बड़ी चाची के यहाँ तीनो भाई बहन रह तो रहे हैं लेकिन बहन जब स्कुल खुलने पर पुनः कस्तूरबा चली जायेगी तो मोहन फिर अकेला हो जाएगा ,मोहन ठीक से बोल भी नही पाता न चल पाता है न खा पाता है तो ऐसे में मोहन का समुचित ईलाज होना भी अति आवश्यक है .

सरकारी फंड रहने के बावजूद कोई सहयोग अबतक नही

1959 में बीआर चोपड़ा ने इंग्लिश फ़िल्म ‘ब्लॉसम इन डस्ट’ का हिंदी चारबा बनाया था- ‘धूल का फूल’. अनाथ बच्चे की कहानी का सार साहिर ने गीत से यूँ बयां किया था- ‘तू हिंदू बनेगा, न मुसलमान बनेगा. इन्सान की औलाद है, इंसान बनेगा.’ मंदिर या मस्जिद की सीढ़ियों, या किसी कूड़ेदान से उठाकर लाए गए, या अनाथालय के दरवाज़े पर पाए गए बच्चे आगे चलकर क्या बनेगा ये किसी को पता नही होता यूं तो यहां कमाल की केमिस्ट्री होती है, सब आपस में मिल जाता है. बच्चा किस स्तर में पलेगा-बढ़ेगा, नहीं कहा जा सकता. पर, फिर भी सवाल उठता है, कि क्या आख़िर सरकार ने कुछ गाइडलाइन बनाई हैं जो अनाथ बच्चों के भरन पोषण एवं पढाई में भी मददगार होती है ,लेकिन क्या इसका उपयोग अनाथों के आर्थिक तथा सामाजिक सुरक्षा में पालन किया जाता है? अनाथ बच्चों के दो भविष्य हैं- या तो वो गोद लिए जाते हैं, या अनाथालय में रहते हुए ही बालिग़ होते हैं. गोद लिए गए बच्चों का देखभाल वही करता है, जो उनके क़ानूनी तौर पर बने माता-पिता होता है. पर उनका क्या जो गोद में नहीं जा पाते? उनका क्या जिसका जमीन है पर घर नही ,माँ बाप के साथ नही तो सरकार का राशन तक नही ? न्यूज लॉउंड्री के एक खबर के अनुसार सरकारों ने कभी इस ओर ध्यान नहीं दिया. वैसे सरकार ने तो ये भी सोचा कि इन बच्चों को एक पुख्ता आर्थिक और सामाजिक संरक्षण दिया जाए. जुलाई, 2018 में लखनऊ की एक्टिविस्ट पौलमी पविनी शुक्ला ने जनहित याचिका दायर की थी जिस पर संज्ञान लेते हुए सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन न्यायाधीश रंजन गोगोई और एक अन्य ने सरकार से जवाब मांगा था कि वो ऐसे बच्चों के लिए सरकारी नौकरियों में क्या प्रावधान देती है. न सरकार से कोई जवाब आया, न कोर्ट को ही याद आया कि उसने जवाब मांगा था. सरकार और कोर्ट ने तत्परता दिखाते हुए अयोध्या और राफ़ेल मामले को सुलझा लिया पर 2 करोड़ अनाथ बच्चों के भविष्य पर किसी को चिंता नहीं है.

फंड और सुचना के बावजूद सिस्टम उदासीन

बच्चों पर काम कर रही गोड्डा जिले की बंदना दुबे बताती है की ‘‘गोद से वंचित रह गए बच्चों को फिर से वैसे ही हालात में छोड़ दिया जाता है,न सरकार के पास इनके आंकड़े होते हैं न सरकार द्वारा मिलने वाली कोई सुविधा. सोचिए, वो बच्चे जिसके न मां-बाप हैं, न कोई अभिभावक जैसे-तैसे करके अनाथालय में रहते हैं; स्कूलों में होने वाली पेरेंट्स-टीचर मीटिंगों से मरहूम रहते होंगे, न कोई उनके लिए ट्यूशन की व्यवस्था करता होगा और न बताता होगा कि फ़लां कम्पटीशन की तैयारी कैसे करनी है. क्या वो बच्चे सरकारी नौकरी पाने की गला काट स्पर्धा में जनरल केटेगरी या आरक्षित वर्ग के सामने टिक पाते होंगे? ऐसे हालात में उन बच्चों को किस क़िस्म का रोज़गार मिलता होगा? कितने बच्चे बिन आवास ,बिन भोजन ,बिन शौचालय ,बिन समाज के भटकते होंगे ? कोई आंकड़ा है जो स्थिति साफ़ करता हो?बाल कल्याण समिति के पास वो भी आंकड़ा नही की राज्य या जिले में कितने अनाथ बच्चे हैं और वो कैसे जी रहे हैं ? सरकारी फंड आता है लेकिन कहाँ जाता है इसका भी कोई पुख्ता आंकड़ा किसी के पास नही .राष्ट्रपति के हाथों राजीव गाँधी मानव सेवा सम्मान पाने वाली गोड्डा जिले में अनाथ बच्चों पर काम करने वाली समाज सेविका बंदना दुबे पर जब हमने मोहन जैसे अनाथ बच्चों पर पूछा तो वो कह उठी की मानवीय संवेदनाएं ,समाजिक दायित्व सबकुछ रुक जाता है कानून के आगे ,वो कहती है की मैं कानून का सम्मान करती हूँ लेकिन कानून को भी ऐसे अनाथ बच्चों के लिए सरल होना होगा .मोहन के साथ जब हम दोनों बहनों को लेकर आश्रम आई थी उस वक्त भी मोहन गंभीर बिमारी से ग्रस्त था ,हमने ईलाज भी कराई,बहनों को कस्तूरबा में नामंकन करा दी ताकि पढ़ सके .

बार बार सुचना पर भी अबतक कोई सहारा नही मिला

साथ ही साथ बाल कल्याण समिति गोड्डा को 11-8-18 को पत्र लिखकर सुचना दी थी ,जिसके बाद 13-08-18 को समिति द्वारा मुझसे मोहन के बारे में विस्तृत जानकारी मांगी गई और निर्देश जैसे शब्दों का प्रयोग कर हमे कहा गया की मोहन को समिति के सामने उपस्थित करें ,16 -08 -18 को मोहन के समुचित ईलाज के लिए एवं मोहन की संपूर्ण जानकारी समिति को पत्र के माध्यम से दी गई ,जबकि उस वक्त मोहन महज 16 वर्ष का था ,2018 से अबतक मोहन नाबालिक से बालिक हो गया लेकिन न सरकार जागी न ही सरकार द्वारा बनाई बाल कल्याण समिति.बंदना दुबे बताती है की जब मोहन के साथ दोनों बहनों को लेकर आश्रम आई थी उस वक्त बाल कल्याण समिति भी प्रभावी नही था .

बाल कल्याण समिति के 13 .08 18 के पत्र का जवाब

लेकिन बाद में जे .जे एक्ट आया जिसके तहत हमने भी रजिस्ट्रेशन के लिए कई बार आवेदन डाला लेकिन जिला बाल कल्याण की उदासीन रवैये के चलते जे जे एक्ट के तहत भी हमे रजिस्ट्रेशन नही मिला ,तब लाचार होकर हमे इन भाई बहनों को उनके घर भेजना पड़ा जहां कानून इस मासूम आनाथ के लिए कष्टदायक हो गया . सूत्रों की माने तो गोड्डा ज़िला को वर्ष 2015 से अब तक सरकार द्वारा विभिन्न पत्र से अब तक कुल 17,50,000.00 राशि ऐसे बच्चों के कल्याण के लिए उपलब्ध कराई गई है जबकि ज़िला बाल संरक्षण पदाधिकारी द्वारा अब तक इस राशि को उपयोग में नही लाया गया है। बताते चलें कि जिला बाल संरक्षण पदाधिकारी वर्षो से गोड्डा ज़िले में पदस्थापित भी है।लेकिन सरकारी के फंड के बावजूद ऐसे बच्चे भटकने को मजबूर हैं ,जिन आदिवासियों की लड़ाई लड़कर उनके हक बात कहकर झारखण्ड राज्य का गठन हुआ है उसी सूबे के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के विधानसभा क्षेत्र में 3 भाई बहन अपने आवास,अपने राशन और अपने शौचालय के लिए तरस रहे हैं . प्रश्न ये भी उठता है कि बालिग़ होने के बाद क्या समाज में उनका स्थापन हो पाता है?कानून की बात मानें तो सितम्बर महीने में सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ने एक कार्यक्रम में बताया कि एक अनाथ युवक हर शाम को नौकरी के बाद अनाथालय आ जाता. पूछने पर मालूम हुआ कि उसका कोई है ही नहीं तो वो कहां जाए? ये बच्चे हमेशा ही हाशिये पर रहे हैं.

कब जागेगी अनाथ पर सरकार ?

तो क्या ऐसे में पहले उनके भविष्य से जुड़े मुद्दे पर बहस नहीं होनी चाहिए? और बहस भी क्यों हो? सीधा सा मसला है, उन्हें लाभ दिया जाये. ये तबका ही वो असल सर्वहारा है जिसके ऊपर समाजवाद का सिद्धांत टिका है. ये तबका कभी नहीं जीत सका है. और अगर कोई जीता भी तो इक्का-दुक्का. पर ये तबका जो राजनेताओं के लिए वोट का बायस नहीं बनता, कोई मंच नहीं है जो पुरज़ोर तरीक़े से इनके हक़ में आवाज़ उठाये. आंकड़ों के हिसाब से देश में इस वक़्त 2 करोड़ से भी ज़्यादा अनाथ हैं. सरकार ने प्रति बच्चे 2000 महीना रूपये मुकर्रर किये हैं. अब देश को सोचना ये है, जहां आये दिन क़र्ज़ माफ़ हो रहे हैं, कॉर्पोरेट सेक्टर्स को रिलीफ़ पैकेज दिए जा रहे हैं, इन बच्चो के लिए सरकार क्या कर रही है. क्या कोई ऐसा है जो इन बच्चों की सुध ले. कोर्ट कानून से तो उम्मीद की जा सकती है. पर गोगोई साहब भी शायद प्रश्न पूछकर भूल गए थे. उन्होंने तो प्रेस कांफ्रेंस कर इस बात का मलाल ज़ाहिर किया था कि अहम केसेस तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा अपने पास रख लेते हैं और बाक़ियों तो बस छाछ मिल रही है. उसके बाद वो मुख्य न्यायाधीश बने पर उन्होंने क्या किया? उन्हें भी बाबरी मस्जिद, रफ़ाल आदि अहम् मुद्दे लगे. वरना क्या बात थी कि अनाथ बच्चों के लिए दायर की गई जनहित याचिका पर सरकार से जवाब मांगा जाता और जवाब न मिलता? क़ानून की व्यवस्था में अहम केस जैसी कोई बात नहीं होती. अहम होता है न्याय और इन बच्चों को भी न्याय मिले. अगर सरकार को चिंता नहीं है, तो वही सरकार को दुबारा तलब करे और उन्हें न्याय दिलाये.यह सवाल न सिर्फ सरकार और कानून से है बल्कि उस समाज से भी है जो अपने इर्द गिर्द ऐसे बच्चों को देख मुह फेर लेते हैं ,क्या ऐसे बच्चों को जीने का समाजिक हक नही ?क्या सरकार द्वारा दी जा रही सुविधा इन अनाथों के काम नही ?क्या बिन अपराध भी नाबालिक अनाथ सेल्टर होम में रहेंगे ?सरकारें आएँगी जाएंगी लेकिन कानून के रखवालों को इस अनाथ बच्चों को संभालना होगा ताकि यह भी अपने समाज में रहकर अपना परिवार को गूँथ सके ,ताकि मोहन ठीक होकर अपनी दोनों बहनों की शादी भी अपने दायित्व में पूरा कर सके . अमिताभ बच्चन की फ़िल्म ‘लावारिस’ का गाना था. ‘जिसका कोई नहीं, उसका तो ख़ुदा है यारों’. ये बच्चे भी ख़ुदा के ही हवाले हैं. भाजपा सरकार ने अमरत्व प्राप्त करने के लिए राम मंदिर और राफ़ेल को चुना. क्या हेमंत साहब का यश अनाथ बच्चों के लिए कोई मुकम्मल राह निकलवा कर अमरता को हासिल होगा?

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