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माँ के बुलंद हौसलों ने हमेशा असंभव को संभव कर दिखाया/धीरज झा की कलम से

पुरूष बलशाली है कर्मठ है उसकी चमड़ी मोटी है सख़्त है वो लड़ सकता है सहने की क्षमता ज़्यादा है मगर और कोमल काया की है, कोमल त्वचा सहने की शक्ति पुरुष के मुकाबले आधी से भी कम । मगर यही स्त्री जब माँ का रूप लेती है तो इसके सहने की क्षमता पुरूषों से दुगनी हो जाती है । जहाँ एक फोड़ा जिसका वजन पाँच ग्राम भी नहीं होता वो भी जिस्म पर भारी लगता है और स्त्री जो अब माँ है एक नए और बढ़ते हुए जीवन को मुस्कुराते हुए अपने अंदर नौ महीने तक रखती है । उसके बाद असहनीय पीड़ा सह कर उस जीव को नया जीवन देती है कई बार तो एक नए जीवन के लिए उसे अपना जीवन तक कुर्बान करना पड़ता ।
और यही वो वजह जिस कारण बच्चे के जन्म में पिता जो पुरूष है उससे मुकाबले एक माँ जो स्त्री है उसका समर्पण और योगदान ज़्यादा माना जाता है । कहते हैं पिता मकान बनाता है मगर उसे घर बनाती है माँ । कमाते पिता हैं मगर घर चलाने का हुनर माँ ही जानती है । एक बच्चा पिता को सारी सुख सुविधाएं दे कर शायद पितृऋण से भले ही मुक्त हो सकता है मगर कोई भी जतन कर के वह मातृऋण से मुक्ति नहीं पा सकता ।
एक बहुत बड़े ज्ञानी थे, जब चारों ओर उनका नाम जाना जाने लगा तो उनके मन में आगया कि अब मैं माँ का कर्ज़ चुका सकता हूँ । ये इच्छा उन्होंने माँ के सामने प्रकट की । माँ मुस्कुराई और बोली ठीक है चुका देना कर्ज़ मगर आज रात तू मेरे साथ सो । ज्ञानी बेटा थोड़ा सकुचाया मगर फिर बोला ठीक है मैं सोऊंगा । रात हुई दोनों एक ही बिस्तर पर सोने लगे । जिधर बेटे ने सोना था माँ ने वहाँ पानी गिरा दिया । बेटा झल्लाया बोला “माँ ये क्या है ? मैं इस गीले बिस्तर पर कैसे सोऊंगा ?” माँ मुस्कुराई बोली और बोली “जानता है कितने वर्षों तक तू बिस्तर गीला कर देता था सोते हुए । तब मैं तुझे सूखे में सुला कर खुद गीले में सोती थी । और आज तू एक दिन माँ के लिए गीले बिस्तर पर नहीं सो सकता । तू तो एक दिन का कर्ज़ ना चुका पाया बेटा पूरे जीवन का कैसे चुकाएगा । वैसे भी माँ तो बच्चे के पैदा होते उसका मुंह देख कर उसे अगले पिछले सभी कर्ज़ों से मुक्त कर देती है ।” ज्ञानी बेटे के पास कोई जवाब नहीं था बस माँ के पैरों में लेट गया ।
माँ शब्द ही शक्ति का सूचक है । एक माँ का विश्वास, लगन और मेहनत अपने बच्चे से कोई भी असंभव काम करवाने का सामर्थ रखती है । ऐसे कुछ उदाहरण आपके सामने पेश कर रहा हूँ । 
1. वो विकलांग थी । पोलिओ से ग्रसित, गरीब परिवार से थी । मगर मन में चाह थी दौड़ने की दौड़ते हुए उड़ जाने की । डाॅक्टर ने कहा ये चल नहीं सकेगी सारी उम्र । वो मायूस हो गई । बड़े भारी मन से उसने माँ से पूछा “माँ क्या मैं सच में कभी नहीं चल पाऊंगी ?” माँ ने सीने से लगा कर कहा “भगवान में विश्वास और कड़ी मेहनत असंभव को संभव बना सकती है । मुझे यकीन है तुम चल सकती हो ।” उसे डाॅक्टर से ज़्यादा माँ की बात पर यकीन था । उसने संघर्ष किया और एक दिन दुनिया की सबसे तेज़ महिला धावक बनी । वेलमा रुडाल्फ़ जिन्होंने नियती को मात दे कर जीते तीन स्वर्ण पदक ।
2. वो ऊंचा सुनता था । ग़रीब था । ड्रेस और स्कूल फीस ना होने की वजह से उसे चिट्ठी दे कर घर भेज दिया गया । उसने चिट्ठी आ कर माँ को दी । माँ ने देखा चिट्ठी में लिखा था “ना इसके पास ड्रेस है ना इसकी फीस जमा है और वैसे भी यह इतना मंदबुद्धि है कि इसकी पढ़ाई पर खर्च करना पैसे व्यर्थ करना ही है ।” उसने पूछा क्या लिखा है । माँ ने आँसू छुपा कर मुस्कुराते हुए कहा “लिखा है आपका बेटा इतना होनहार है कि उसे स्कूल आने की ज़रूरत ही नहीं आप उसे घर पर ही पढ़ाएं ।” माँ ने खुद से ही उसे ऐसा पढ़ाया की वो मंदबुद्धि बालक सारी दुनिया को बल्ब की रौशनी और ना जाने कितने महत्वपूर्ण आविष्कार देने वाला थाॅमस ऐल्वा ऐडिसन बना ।
3. उसे क्रिकेट खेलना था मगर वो गरीब था । पिता वाॅचमैन थे जिनकी तनख्वाह से तो घर ही मुश्किल से चल पाता था । मगर माँ नर्स थी अपनी छोटी सी तनख्वाह में से पैसे जुटा कर बेटे को क्रिकेट किट ले कर दी । जब वो सतरह साल का था तब माँ आँखों में ये सपना लिए दुनिया छोड़ गई कि वो उसे टी वी पर भारतीय टीम की तरफ से खेलता देखे । माँ चली गई मगर उसने माँ का सपना पूरा किया । आज रविन्द्र जडेजा को भारत के सफल ऑलराऊंडर के रूपें जाना जाता है ।
4. पिता तब गुज़र गए जब बच्चपना ही था पीछे छोड़ गए आलू चिप्स बनाने की छोटी सी भट्ठी और बहुत सी ज़िम्मेदारियाँ । बच्चपन में बोलने में अटकता था । सब मज़ाक उड़ाते थे । माँ समझाती थी तेरी आवाज़ ही तेरी पहचान बनेगी । जिस दिन तेरी आवाज़ में आत्मविश्वास आ जाएगा उस दिन ना तुझे कोई रोक पाएगा ना तेरी आवाज़ को । माँ हिम्मत बढ़ाती गई बेटा बढ़ता गया बिना हारे लंबा संघर्ष करने के बाद 44 की उम्र में पहली फिल्म में ब्रेक मिला । आज भारतीय सिनेमा की कई फिल्मों में अपना अहम किरदार निभा कर बोमन ईरानी करोड़ों दर्शकों के दिलों में जगह बना चुके हैं ।
ये तो कुछ एक उदाहरण हैं मगर इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं ऐसे अनगिनत उदाहरणों से जिसने हमेशा सिद्ध किया है कि माँ के बुलंद हौंसले असंभव को भी संभव बना सकते हैं । माँ का दर्जा इसीलिए बड़ा है कि वह किसी भी परिस्थिति में ना खुद हारती है ना अपने बच्चे को हारने देती है ।  हम नमन करते हैं दुनिया की सभी माँओं को जिनकी वजह से हमारा अस्तित्व बना हुआ है । 
धीरज झा

About मैं हूँ गोड्डा (कार्यालय)

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