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सिस्टम से हार गया मोहन,नही था बहन के पास देने को कफ़न,पंगु बनी रही सिस्टम ।

राघव मिश्रा,गोड्डा/यह कहानी है तीन अनाथ भाई बहनों की है, जिनका नाम है शांति, प्रमिला और मोहन कि जो गोड्डा जिले के सुंदरपहाड़ी प्रखंड क्षेत्र के सुंदरमोर गांव के रहने वाले है। इन तीनों की जिंदगी सिस्टम और कानून के पेंचों में कुछ ऐसे उलझी की आज तक सुलझ न सकी।

वर्षों पहले पिता की मृत्यु के बाद तीनों भाई बहन अपनी मां के साथ रह रहे थे। लेकिन एक दिन मां का साया साया भी इनसे छिन गया, जिसके बाद तीनों भाइ बहन अनाथ हो गए ।अनाथ बहन और मानसिक रूप से बीमार भाई की देख के लिए समाज सेविका वन्दना दुबे आगे आई और परिवार के ही अभिवावक से बच्चों को लेकर शांति और प्रमिला को बेहतर शिक्षा के लिए कस्तूरबा विद्यालय में नामांकन करा दिया । अभिवावक की देखरेख एवं वन्दना के सहयोग से दोनो बहनें अपने बेहतर भविष्य बनाने की ओर अग्रसर थी ।

भूख से मर गया मोहन, सिस्टम देखती रही तमाशा :

मोहन का भी इलाज करवाया जा रहा था, लेकिन एक दिन ऐसा वक्त आया कि कानून और सिस्टम के पेंचों में फंसकर बन्दना ने मोहन को CWC यानी कि child welfere committe के हवाले कर दिया, शांति और परमिला अभी भी कस्तूरबा में पढ़ रही थी ।लेकिन मोहन को CWC वालों ने उनके परिवारिक अभिवावक को सौंप कर अपना पल्ला झाड़ लिया ।इसी बीच लॉकडाउन भी लग गया और अन्य विद्यालयों की तरह कस्तूरबा स्कूल भी बन्द हो गया। जिसके कारण शांति और परमिला को भी अपने अभिवावक के साथ रहना पड़ा। शांति कहती है कि इन लोगों ने हमे बहुत तकलीफ दि है। जिस तरह हम बन्दना दीदी के सहयोग से रहते थे इन सभी ने मिलकर मुझसे वो भी छीन लिया है ।शांति कहती है मेरे भाई की मौत भूख की वजह से हुई है उसे ठीक से खाना भी नही मिलता था ।

मोहन की स्थिति ऐसी थी कि वो ठीक से खा भी नही सकता था, पड़ोसियों ने उसे गाय के गोहाल में रख दिया, वहीं उसे खाना पहुंचा दिया जाता था और दोनों बहनें मिलकर मोहन की सेवा में लगी रहती थी। मोहन पर क्या बीतती थी इसे आंकना हमलोगों के लिए काफी कठिन है।

उपायुक्त के निर्देश के बावजूद भी नही मिल सका मदद :

पिछले वर्ष हमने मोहन, शांति और परमिला की कहानी दिखाई गई थी। जिसके बाद इसपर संज्ञान लेने के लिए महगामा विधायक ने मुख्यमंत्री और गोड्डा डीसी को टैग करते हुए ट्वीट किया था, फिर ट्वीट के जवाब में जांच टीम भी गठित हुई और उपायुक्त के निर्देश पर कई कागजी घोषणाएं भी ।लेकिन एक वर्ष बीत जाने के बाद भी न मोहन को आवास मिल सका न ही शौचालय और न ही स्पॉन्सरशिप योजना के तहत एक चवन्नी भी मिली।

मोहन के परिवार में मोहन के अलावा सिर्फ दो बहनें ही थी जो उसका खयाल रख रही थी ।मोहन के हिस्से में अच्छी खासी जमीन भी थी, लेकिन परिवारिक अभिवावक ने उसे कभी देना नही चाहा ।शांति और परमिला पूरे लॉकडाउन में मोहन की देखरेख में लगी रही । अब कानूनी पेंच में इस तरह इनकी जिंदगी फंसी हुई थी कि अब वो समाजिक कार्यकर्ता वन्दना से भी मदद मांगने के लिए नही जा सकती थी ।

मोहन के जाने के बाद बहन के हाथ मे कफ़न खरीदने के पैसे नही थे :

और अनेकों कठिन दिन असहाय रूप से गुजारने के बाद एक दिन मोहन ने दोनो बहनों का साथ भी छोड़ दिया।समय के साथ मोहन की हालत बिगड़ती चली गई, न सही से इलाज मिल सका, न ही सही से भोजन। तड़पकर-तड़पकर मोहन की जान चली गई । मोहन की बहन शांति कहती है कि भैया के जाने के बाद हमलोग बेसहारा हो गए।

कोरोना से मृत्यु में कफ़न बांटने वाली सरकार के मुखिया के विधानसभा क्षेत्र में एक भाई की मौत के बाद बहन के हाथों में कफ़न खरीदने तक के पैसे नही थे।मोहन की मृत्यु के बाद भी न CWC से कोई लोग देखने गए न ही बाल सरंक्षण ने कोई मदद भिजवाई ।शांति कहती है की उनलोगों ने हमे ठगा है वे वादों का पुलिंदा बांध के चले गए लेकिन, आजतक हमे कुछ न मिला।

अब शांति और परमिला अकेली हो चुकी है दोनों आगे पढ़ना चाहती है।कस्तूरबा में ऑनलाइन पढ़ाई हो रही है ऑनलाइन परीक्षा भी लि जा रही है। लेकिन शांति और परमिला के हाथों में न मोबाइल है न ही ऑनलाइन पढ़ाई की कोई व्यवस्था । शांति मैट्रिक में है और डाक्टर बनना चाहती है लेकिन, अब उसकी उम्मीदों का सूर्यास्त होने लगा है।

विभाग के पास लाखों रुपये लेकिन अधिकारी कुंडली मारकर बैठे :

जबकि सिस्टम में उन्हें संवारने के लाखों पड़े हैं ,विभागी सूत्रों के अनुसार स्पॉन्सरशिप योजना एवं बाल संरक्षण के लिए 25 लाख रुपये विभाग के पास पड़े हुए हैं।

लेटर नंबर 123 तारीख 1-10-15 को 150000 रुपये,लेटर नम्बर 380 तारीख 23-10-18 को 100000 रुपये,लेटर न.684 तारीख 11-10-18 को 5000000 रुपये,लेटर न.216तारीख 03-10-19 को 200000 रुपये,लेटर न.157 तारीख 31-03-20 को 800000 रुपये,लेटर न. 257 तारीख 21-10-20 को 200000 रुपये,लेटर न. 48/30-03-21 को 800000 रुपये विभिन्न लेटर के माध्यम से भेजा गया लेकिन दिसंबर 2020 तक विभाग ने एक रुपये तक खर्च नही किया ।

अब इन रुपयों पर किसकी कुंडली पड़ी हुई है यह तो नही पता, लेकिन दोनों अनाथ बहने अपने भाई को खोने के बाद बिल्कुल भटकने पर मजबूर हो गई है ।

शांति मुख्यमंत्री से मिलना चाहती है, वो अपना दर्द बताना चाहती है कि किस तरह एक आदिवासी बेटी जंगल से निकलकर अच्छी तालीम ले रही थी, जिसे हालात के ऐसे थपेड़े पड़े जिसमें अब सबकुछ खोया खोया सा लगता है ।

कागजी पन्नो पर बड़ी बड़ी बातें लिखने वाले सिस्टम के सामने अनाथ बहनों ने माता पिता खोने के बाद अब भाई को भी खो दिया लेकिन इस सरकार और सिस्टम को शर्म तक नही आई।

विधानसभा अध्यक्ष के ट्वीट के बाद जागा प्रशासन :
इस कहानी को हमने प्रमुखता से दिखाई जिसके बाद विधानसभा स्पीकर ने ट्वीट कर गोड्डा डीसी को अविलंब कार्रवाई करने का निर्देश दिया और कहा कि सूचना क्रांति के इस युग मे यह तस्वीर सही नही ।

CWC मामले को ढकना चाह रही है :
इधर मोहन की मृत्यु के ठीक दो दिन बाद छोटी बहन शांति बीमार पड़ गई ,और स्पीकर का ट्वीट के बाद विभाग आनन फानन में अस्पताल पहुंचा जहां सुंदरपहाड़ी बीडीओ ने बताया कि स्पेशल केयर के लिए आये हैं,अबतक क्यों सुविधा नही मिल पाई है इस सवाल पर बीडीओ ने गोल मोल जवाब देकर यह कह दिया कि विभाग को पत्र लिखा गया है जल्द सबकुछ पूरा होगा ।

इधर स्पॉन्सरशिप योजना को लेकर जैसे ही बाल संरक्षण पदाधिकारी रितेश कुमार से सवाल किया तो वो मुह छुपाकर भागते नजर आए ।जबकि पिछले 6 वर्षों से ये पदाधिकारी जिले में कुंडली मारे बैठे हैं ।

घर पर नही रहना चाहती है दोनो बहनें,ठीक से नही मिलता है खाना :भूखे पेट चार घँटे तक चला काउंसेेेलिंग :

अस्पताल से डिस्चार्ज के बाद शांति और परमिला को CWC ने करीब चार घँटे भूखे प्यासे रखा जबकि अस्पताल से निकलने के बाद शांति के हाथों से निडिल भी नही निकला था ।शांति परमिला घर नही जाना चाहती थी,वो कहती है मोहन भैया को खाना के बिना मार दिया हम वहां नही जाना चाहते,हम पढ़ना चाहते हैं और दीदी बन्दना के पास रहना चाहते हैं,लेकिन ये लोग सेल्टर होम भेजने की तैयारी कर रहा है। जबकि शांति की बड़ी बहन अब बालिग हो चुकी है ।

अब बड़ा सवाल यह है कि क्या एक बच्ची अपने अनुसार पढ़ नही सकती ? क्या CWC सिर्फ कानून की आड़ में बेसहारा बच्चों का भविष्य खराब करने पर तुली है ?बाल संरक्षण में 25 लाख से ऊपर रहने के बावजूद आखिर इन बच्चों के ऊपर क्यों खर्च नही किया जा सका? मोहन की मौत के पहले क्यों नही जागा सिस्टम ? क्यों 6 वर्षों से कुंडली मारे बैठा है बाल संरक्षण पदाधिकारी ? और तो और क्या बड़ी बहन के बालिग हो जाने के बावजूद उसे अपने अनुसार जीने और रहने का हक क्यों नही दे रही ? ऐसे कई सवाल हैं जो सिस्टम को पंगु बना रही है ।

अब देखने वाली बात तो यह होगी कि सरकार के मुखिया अपने ही विधानसभा क्षेत्र की इस आदिवासी बेटी को पढ़ाने के लिए सरकार आगे आती है या फिर यूं शांति और परमिला अपने मूलभूत सुविधा से वंचित ही रहेगी ।

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