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प्रीत-चंदन के बिच का प्रीत/कहानी

“चंदनिया प्रीत”

बात तब की है जब मुँह में ‘तिरंगा’ और जुबान पर ‘जा झार के’ वाली पनीली तान थी …, तब रेडियो पर विविध भारती बजती थी …, तब टाटा इंडिकॉम का ‘नया टुनटुना’ आया था …., तब अल्ताफ़ राजा का ‘जा बेवफा जा…तुझे प्यार नहीं करना’ चोट खाये मुलाजिमों की पहली पसंद थी …, तब चिट्ठीयां प्रेम संग सूखा-पिचटा गुलाब लिये सरसो के खेत मे मिलती थी …, तब दो दिलदार दिल भी हुआ करते थे …, एक प्रीति और एक चंदन ।

इशकजादे चंदन की प्रीत ओढे प्रीति चंदनिया हुई जा रही थी , लेकिन पहल के अभाव में भाव एवं भावनाओं की मंगनी भी न हो पाई थी अभी,,,,,,न तो शुभ नक्षत्रों का संयोग जुट पा रहा था न ही डीह बाबा , काली माई की अगरबती – मोमबत्ती , धूप – सकील वाली भभूति ही काम आ रही थी।

“तमाम तरह की मौजूद फ्लू के बीच ‘प्रेमफ्लू’ दुनिया का एकलौता ऐसा ज्वर है जिसमें बदन तपता नहीं जम जाता है”

इस अवस्था में प्रेमी दिलों की हलचल अगर कोई महसूसता है तो वो है बेचारा आईना…।
अजय देवगन कट से लेकर तेरे नाम कट तक दुनिया सफर कर चुकी पर जो चिर , अपरिवर्तित है अब तक , वो है आँखों में ढाई किलो मोहब्बत और बालों में पौने दो सौ ग्राम करुआ तेल पोत आईने में खुद को निहारते हुए गुनगुनाना !
‘भोली सी सूरत,,,,आँखों में मस्ती,,,दूर खड़ी शरमाये,,,आये हाय!’
हाय रे प्रेम …

अचानक से रातें बड़ी लंबी हो गई थी …, नींद जो न आनी थी …, नींद भला कैसे आये जब आँखों में ‘वो’ आ गये थे और तब ‘इंडिया डिजिटल’ भी कहाँ हुई थी । चंदन का ख्वाब राजनीति की घोषणापत्र बन गई थी और उधर प्रीति की करवट नेता जी के बयान की तरह कभी इस तरफ कभी उस तरफ…
‘प्यार बिना चैन कहाँ रे….’ हाय रे…

खैर ! खरमास के बाद मधुमास भी आता ही है !
माहे दिसंबर साल समेत अंत की तरफ अग्रसर था पर कुछ तो था जो अभी भी बाकी था , अटक गया था कहीं…

मिलते तो नदी के दो किनारे भी है …, बस नियति का बाँध भरा हो!

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‘प्रीति जी ! हमको कुछ कहना है ‘
‘क्या ? कहिये ‘
‘आप न हमारे गांव ही रुक जाइये’
‘यहीं कहना था..?’
‘ह….न,…न….आप न साड़ी में बड़ी अच्छी लगेंगी’
‘ये कहना था ?’
‘हम्म्म्म …, न …, आप न हमको बहुत अच्छी लगती हैं’
‘अच्छा जी ! हम तो सबको अच्छे लगते हैं तो ? ‘
‘मने हम दिल मे बसाना चाहते हैं आपको , अपना बनाना चाहते हैं आपको’

‘अच्छा! तो आपका दिल , दिल्ली की कॉलोनी है ?
‘मेरा मतलब है कि हम आपसे बहुत प्रेम करने लगे हैं …, हम अब किसन भगवान के कसम खाये हैं आपही के साथ जीना आपही के साथ मरना है …., हम न जी पायेंगे आपके बिना ‘

चंदन की मोहब्बत की मिसाइल छूट चुकी थी और इस यंत्र की सफलता की तस्दीक़ ही थी कि प्रीति लाज की चंदनिया में नहा गुलाबी हो चली थी।

पैर की उँगलियों से मिट्टी कुरेदते हुए मद्धिम स्वर में प्रीति भी बोल पड़ी ‘ए जी ! प्रेम तो हम भी आपसे करते हैं ‘

और चंदन जब तक इस जवाबी झटके से उबरते तब तक प्रीति लज्जाते हुए भाग चुकी थी ।

 

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About Raghav Mishra

Raghav Mishra is a freelance journalist, has established himself as a young journalist in the field of journalism, Born in 1988 Raghav Mishra is a resident of Latouna village in Godda district of Jharkhand state, he started maihugodda digital media in 2012. Since its inception, since then, maihugodda has been continuously touching new heights everyday. Raghav Mishra's early studies were written in Godda district. He liked to engage with technology since childhood and kept exploring new things everyday. As of today, Raghav Mishra is also working as a technical expert on several big digital news channels. He loves to catch up on his technology and do creative work daily. Raghav Mishra is the founder of "maihugodda" digital news channel.

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