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चारा बिना बिक रहा मवेशी,किसानों के लिए गंभीर समस्या,सरकार के लिए चुनौती।

राघव मिश्रा/अभिमन्यु के हलक सूखे पड़े हैं और गणेश की जिंदगी हलकान है .धरती की छाती को छांव देने वाले पेड़ भी मवेशियों की जान बचाने में लगे हैं ।बहियार(खेत) में मरे हुए लुस्सी(घास) से लेकर अब खजूर के पेड़ों की तलाश हो रही है कि किसी तरह हम अपने मवेशी को जिंदा रख सकें ।

मवेशी के लिए खजूर का पत्ता ढोता दिव्यांग प्रभास
मवेशी के लिए खजूर का पत्ता ढोता दिव्यांग प्रभास

फिर भी एक पैर से दिव्यांग, सुबह सुबह लंगड़ाते हुुुए जब भूगोल विषय पर बीए कर रहा “प्रभाष” मिला तो उसके हाथों में काफी दूर से चलकर ला रहे कांटो भरी पत्तियों का बोझा था।
हाथों में कचिया वाला लघ्घा लिए माथे पर वही कांटों की पत्तियों के बोझा(बंडल)लेकर अभिमन्यु भी पगडंडियों के सहारे चले आ रहा था ।

मवेशी के लिए खजूर का पत्ता ढोते अभिमन्यु (किसान)
मवेशी के लिए खजूर का पत्ता ढोते अभिमन्यु (किसान)

मवेशी बचाने के जद्दोजहद में गांव के रामवृक्ष यादव,जगदीश मंडल के अलावे गणेश ठाकुर भी मिले जो सुबह सुबह कांटो से भरी पत्तियां काटने सिर्फ इसलिए गांव से मिलों दूर जाते हैं ।क्योंकि अब वो सोने की चिड़िया वाले देश की हरियाली खेतों में नही, अब घर मे न मवेशी को खिलाने के लिए कुछ सानी भूंसा बचा है,न पुआल न ही घास ।बस खजूर का पत्ता ही एक मात्र सहारा ।

मो.फुदिया देवी
मो.फुदिया देवी

मो.फुदिया और  पार्वती देवी के चेहरे पर अपने जीवको पार्जन के स्रोत मवेशियों को बचाने के दर्द और माथे पर पसीने की बूंदें साफ झलक रही थी ।

मवेशियों का एक मात्र सहारा खेतों में हो चारा :

तिल-तिल कर वर्षों से सूखा नहर और बालू विहीन सिकुड़ती नदियां तो कब की रेत के छोटे-बड़े टीलों और ढूहों में तब्दील हो चुकी हैं ।

मुख्य नदियों की स्थिति
मुख्य नदियों की स्थिति

झारखण्ड के गोड्डा जिले के लतौना गांव में जानवरों को बचाने की बेबसी कई किसानों की आंखों में झलक जाती है.
शारीरिक रूप से दिव्यांग प्रभाष कुमार बताता है कि चार चार भैंसों को जिंदा रखने के लिए सुबह 6 बजे उठकर कंटीली खजूर की पत्तियां काटने दूर तलक जाता हूँ ,खेतों में मवेशी के लिए चारा नही बचा,अब खजुर की पत्ती के सहारे अपने मवेशी को जिंदा रख रहे हैं,गांव में जितने खजूर के पेड़ थे सभी वीरान हो गए अब दूसरे गांवों में पत्तियां काटने जाने पर वहां के लोगों को समस्या आ रही है ।लोग अपने मवेशी के लिए बचाकर रखना चाहते हैं ,वो कहता है कि रोज सुबह छुपाकर छुपाकर पत्तियां काटकर अपने मवेशी के लिए लाता हूं.दो दो किलोमीटर दूर जाना पड़ता है ।

चारा बिना मवेशी की हालत
चारा बिना मवेशी की हालत

पेड़ों की झाड़ियों और कंटीली पत्तियों के सहारे मवेशी पालना आसान नहीं होता.तब जब उसी मवेशी को बेचकर घर की बेटी की शादी करने से लेकर उसी मवेशी के सहारे अपने लिए मुट्ठी भर खेतों से अन्न उपजाना पड़े ।

नाद में पुआल और घास की जगह खजूर पत्ता खाता मवेशी ।
नाद में पुआल और घास की जगह खजूर पत्ता खाता मवेशी ।

सानी भूंसा बिन मवेशी बेचने को मजबूर किसान :

लगातार तीन वर्षों से के खेतों में मारा से प्रभावित लतौना के रामवृक्ष यादव कहते हैं की सानी भूंसा नही रहने के कारण मवेशी को खजूर के पत्ता खिलाने तक कि नौबत आजतक नही आई थी,हमने दो भैंसे बेच दिया ,क्या करें खिला ही नही पाते हैं तो दरबाजे पर जानवर को मारेंगे नही न ।
वहीं ठीक पीछे खड़ा विभाष यादव कह उठता है कि मवेशी नको खिला नही पा रहे इसकारण हमने भी दो मवेशी को बेच दिया ।

सरकार के लिए मवेशी बचाने की चुनौती :

लोकसभा से लेकर विधानसभा चुनाव के दौरान हम कई इलाके गए.लेकिन चुनावी सियासत के एजेंडे में खेतों के लिए पानी जैसे बुनियादी मसलों पर सवाल काफी कम रहा ।
किसान बेपानी जिंदगी के चुभते हुए सवालों को लेकर डबल इंजन की सरकारों पर चढ़कर उतर गई ,लेकिन हालात नही बदले ।जन, जंगल, जमीन को बचाने निकली हेमंत सरकार के लिए जानवर बचाना भी एक चुनौती से कम नही ,मौजूदा सरकार को भी इस भीषण जद्दोजहद की बेचैनी शायद नहीं दिखती. जनता के नुमाइंदों को ये सवाल शायद बहुत परेशान नहीं करते.
इन्हीं सवालों के जरिए कैसे वोट के समीकरण साधे जाएं, इसकी कोशिशें लगातार जारी है. कुछ ही महीने बाद पंचायत चुनाव हैं. लिहाजा वादे, आश्वासन का जोर है.गांव की सरकार भी इस भयावह स्थिति से निजात दिलाने में पानी-पानी हो रही ।

किसानों के लिए मवेशी बचाने का एक मात्र उपाय खजूर की पत्ती ,जिसे मवेशी को देता किसान ।
किसानों के लिए मवेशी बचाने का एक मात्र उपाय खजूर की पत्ती ,जिसे मवेशी को देता किसान ।

ऐसे ही गोड्डा जिले के ग्रामीण इलाकों के जिस दूरदराज के गरीब ,आदिवासी एवं बीपीएल परिवारों के टोले की तरफ जाएं, तस्वीरें तस्दीक करती दिखाई पड़ेगी कि बड़ी आबादी के सामने पानी ने जिदंगी की दुश्वारियां बढ़ा दी है मवेशी को कांटे भरी पत्ती खिलाने पर मजबूर किसान के इन तस्वीरों के साथ सवाल भी हैं :

◆झारखंड अलग राज्य की खुशियां हक-अधिकार विकास के दमदार दावे. गांव- गिराव और खेतों के मेढ़ों तक पानी की धार पहुंचाने वाली कृषि योजना लोगों तक पहुंचने से पहले गुम कहां हो जाते हैं.?
◆इधर बड़े बड़े सभागृहों और चैंबरों में मेजों पर सजी बिसलेरी की बोतलों के बीच होने वाली मीटिंग-सीटिंग, फरमान, टोल फ्री नंबर जारी करने और सिस्टम को धरातल पर उतारने का जो वर्षों की कथित प्रक्रिया चलता है. उससे जमीन पर रत्ती भर राहत क्यों नही पहुंचती है यह कह पाना भी मुश्किल है?

यह समस्या सिर्फ लतौना गांव की ही नही है बल्कि कमोबेश आसपड़ोस के कई ग्रामीण इलाकों में हो चुकी है ।

मवेशी और खेती पर आश्रित प्रभाष कुमार के चाचा को भी जब हमने देखा कि सानी भूंसा की जगह वही खजूर की पत्तियों को छीलकर अपने मवेशी को दे रहे थे तो हमने इस समस्या को बेहतर तरीके से जानने के लिए और किसानों से मिला.ठाकुर टोले में गणेश ठाकुर के गुहाल(पालतू पशुओं को बांधने वाला स्थान)के बाहर सानी भूंसा एवं पुआल की जगह खजूर की ही कंटीली पत्तियों से भरा टोकरी रखा था,उससे ही वो अपने चार पांच मवेशी को पाल रहे हैं,गणेश ठाकुर कहते हैं कि पानी बिना मारा होय गेलै खेत ,कहीं घास नाय मिलै छै तै की करबै ,एक्के उपाय खजूरी करो पत्ता बचलों छों जेकरा खिलाय कै मालजाल जोगी रहलो छियों (खेतों में पानी के बिना उपजा नहीं हुआ.कहीं भी घास नही मिलता है तो क्या करें ?एक ही उपाय खजूर का पत्ता है जिसको खिलाकर अपना मवेशी पाल रहे हैं ।कृषि के लिए पानी की व्यवस्था न रहने पर ठाकुर टोला की मो.फुदिया देवी कहती हैं- ‘खींच ले फोटवा, सरकार और साहेब का दिखाय दिहो ,ई सब’ कैसें मालजाल पोसबै हुनखा नाय पता (तस्वीर ले लीजिए, साहब,सरकार को दिखाइएगा, उन्हें ये पता नहीं कैसे मवेशी को पाल रहे हैं) पार्वती देवी कहती है कि हैरँग जानवरो कै खाना बस्तिल परेशान छियों कि मरलो लुस्सी(मरा हुआ घास)आरु खजूरी पत्ता खिलाय के जिंदा रखलो छिंयों.आपनो पेट भरियों कि जानवरो करो? (इसकदर जानवर के भोजन के लिए परेशान हैं कि मरा हुआ घास और खजूर का पत्ता खिलाकर जिंदा रखे हैं.अपना पेट भरें या जानवर का? ) लोगों कि टिस ये भी है कि वोट के वक्त बड़ी बातें करने वाले नेता बाद में आसानी से मुंह फेर लेते हैं,इसलिए आज ऐसी समस्या आ पड़ी है ।

खजूर की पत्तियों देख ही खुश हो जाते मवेशी

इसी गांव के जटेश दुबे कहते हैं कि हाल ही में सड़क किनारे एक डीप बोरिंग कराया गया,लेकिन वह महज 10 मिनट ही पानी दे पाता है।

मवेशी के लिए किसान हलकान :

पानी बिन बेकार पड़े खेतों से उठ रही समस्या पर अगर पूर्व से ही मुख्यमंत्री से लेकर मुखिया तक ध्यान दिए होते तो आज की स्थितियां किसानों और मवेशियों को राहत जरूर देती ।

भाजपा के विज्ञापन वाला टीशर्ट पहने गांव के ही एक किसान अभिमन्यु मंडल भी रोज की तरह अपने मवेशी के लिए चारा की जगह खजूर का पत्ता काटने जाते हैं ,उसी से उनके मवेशी का भी किसी तरह पेट भर जाता है ।

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अभिमन्यु हैं तो भाजपा समर्थक. लेकिन नई हेमंत सरकार में कृषि ऋण माफी की घोषणा की तारीफ करते हुए कहतें की हय सरकारो से उम्मीद जागलो छै.कुछु बढियां करतै.(इस सरकार से उम्मीद जगा है कुछ अच्छा करेंगे)
अभिमन्यु बोलते बोलते अपने मवेशी और खेतों की चिंता में भावुक हो जाते हैं और कहते हैं कि “हमरा सिनी किसानो कै समस्या यहाय छों की आय मालजाल सभै के कष्ट हो गेल्हों पानी बिना ,भगवाने पानी समय पर सबजगह दै नाय छों आरु कुटाइम कहीं बाढ़ दे दै छय.(हमसब किसानों की समस्या यही है कि आज मवेशी तक को कष्ट हो गया,समय पर भगवान भी पानी सब जगह नही देते हैं और समय बीत जाने पर कहीं बाढ़ ला देते हैं ।

अभिमन्यु मंडल
अभिमन्यु मंडल

लागातर दो तीन वर्षों से खेतों में सुखाड़ का दंश झेल रहे अभिमन्यु जैसे और किसान भी खेतों और मवेशियों पर ही आश्रित है ,अभिमन्यु ने सरकार से उम्मीद भी लगा रखा है कि यह किसानों के लिए ऋण माफी की है तो किसानों के हित के लिए खेतों तक पानी भी पहुंचाएगी.वो कहते हैं कि मारा से ऐसा हाल हुआ है कि बंगाल से पुआल लाकर तीन,चार हजार में बेच रहा है ,वो भी हम गरीब किसान नही खिला पाते ,क्योंकि हम तो किसी तरह मॉनसून की राह ताकते हुए अपना और अपने मवेशी को जिंदा रख रहे हैं ,कहां से लाएंगे पैसा जो एक हजार आंटी नरूआ(पुआल)का 4 हजार देंगे ?

यह सुन हमने अभिमन्यु से एक सवाल किया कि अगर आपकी बातों को सरकार सुन ले और खेतों या नहरों में पानी आ जाय तो फिर ऐसी दिक्कत नही आएगी?
तो अभिमन्यु का जवाब था कि “एह मन गदगद हो जयतै.आजाद होय जयतै हय क्षेत्र ।”(मन खुशी से झूम उठेगा और यह क्षेत्र खुशहाल और आजाद हो जाएगा )।

पानी बिन प्रभावित हुए हैं किसान :

गोड्डा के कई ग्रामीण इलाकों में पानी लोगों की परेशानी का सबब बना है.कई जगह अहले भोर महिलाओं कतार में निकलती हैं.सिर्फ और सिर्फ पानी की तलाश में.
गांव-बस्ती से बाहर निकलिए तो शहर-कस्बे में भी कुछ कम हाहाकार नहीं.कहीं तो आजतक पानी पहुंचा ही नही,तो कहीं आने वाली भीषण गर्मी में पांव फटने से पहले ही सरकारी नलों पर सिर- फुटव्वल है ,तो धरती से पांच सौ फीट नीचे जा पहुंची बोरिंग भी अंतिम सांस ले रही है.दशकों से शहरों की प्यास बुझाने वाली नदी तो कब की सुख चुकी है.और शहरों के लिए कई बड़ी परियोजनाएं सालों से लटकी पड़ी हैं. इन परियोजना के पूरी होने की आस में शहरों में पानी के लिए कोहराम मचा रहता है. पानी के लिए मारपीट और खून तक बहते देखा है.

झाड़ियों में मवेशी के लिए पत्ता काटता किसान
झाड़ियों में मवेशी के लिए पत्ता काटता किसान

संथाल परगना के कई गांवों के ग्रामीण नदी से पानी लाकर पी रहे हैं. संथाल ही नही कोयलांचल के बड़े इलाके में पानी के लिए कोहराम मचा है.इन सबके बीच आश्वासनों का पानी बहता जा रहा है.
तो लगता है कि हर जगह पानी के लिए लोग त्राहिमाम हैं ,बूंद बूंद पानी के लिए खेत तरस रहे हैं.खेत तरस रहे तो मवेशी देख आपको तरस आएगा । सरकार और सिस्टम से अधिकांश लोगों को कोई आसरा नहीं. बस समय पर मौसमी बारिश और मॉनसून पर ही पूरी तरह निर्भर है ।

खेतों में कृत्रिम संसाधनों की कमी ,ऐसे बदल सकते हैं हालात :

ऐसी समस्या एक प्रकार की आपदा है जिससे निपटने के लिए सरकार को चाहे गंगा पम्प नहर योजना हो चाहे सोलर सिस्टम संचालित वाटर पम्प सिस्टम,ऐसी योजनाओं को खेतों के क्यारियों तक पहुंचाना होगा ताकि किसानों को मवेशी बचाने की जद्दोजहद न करनी पड़े ।क्योंकि मवेशी बचाना किसान बचाने के समान है,और किसान बचाने के लिए खेतों को भी बचाना होगा ।

हमने एक आदिवासी चारवाहे को बुलाकर ऐसी स्थिति पूछा तो उसने कहा ”हम ठहरे आदिवासी, इसी हाल में जीना है. खेत खलिहान ,जंगल झार, नाली नहर जब सूखने लगे, तो हमें अहसास हो जाता है कि कोई बड़ा विपदा आने वाला है.किसानों के लिए सरकारी योजनाएं इधर नही आती ।

कड़वा सच :

”दो डेगची पानी के लिए गांवों के आदिवासी किन सितम से गुजरते हैं, इसे और करीब से देखना है तो दो- तीन दिन ऐसे इलाके में घूम जाइए”.

यह कड़वा सच है कि सूखे की वजह से सब परेशान हैं. क्या इंसान, क्या जानवर. लोग घर-बार खेती बारी छोड़ कर बाहर जाने को विवश हैं.और किसान अपने मवेशी बेचने को मजबूर,ये कहानी उस राज्य की है जहां का सालाना बजट 85 हजार 370 करोड़ (2020-21) है.

अधिकारी कहते हैं मुद्दा है ज्वलंत :

मवेशियों को भोजन में होने वाली परेशानियों को लेकर जब हम जिले के प्रभारी उपायुक्त सह उप विकास आयुक्त सुनील कुमार से मिले तो उन्होंने भी इसे गोड्डा जिले के लिए एक ज्वलंत मुद्दा बताया .कहा कि जिला पशुपालन एवं कृषि पदाधिकारी से मवेशियों के लिए भोजन की व्यवस्था कराने को लेकर एक मंतव्य माँगा गया .जिसके आधार पर सूबे के विभागीय मंतव्य भेजा जायेगा.और मार्ग दर्शन के आलोक में जो भी होगा अग्रतर कार्यवाई की जाएगी .

 

पूरे संथाल में कमोबेश यही हालात हैं. नदी नाले और खेत तो सूख ही चुके हैं और चापाकलों में बस इंसान के जीवन बचने लायक पानी अभी निकल रहा है.सूखे की वजह से सब परेशान हैं. क्या इंसान, क्या जानवर. बिन पानी सब सून सा लगता है.

गोड्डा जिले में भी सुखाड़ का खासा असर पड़ा है,चाहे गोड्डा जिले के पथरगामा प्रखंड हो या आसपड़ोस का कोई इलाका ,कई परिवारों के सामने पानी बड़ा संकट बना हुआ है न सिर्फ पीने के पानी के लिए चापाकल खराब है.बल्कि सुखी नदी ,नहरों और पत्थरों के बीच अपने खेतों तक पानी न पहुंच पाने के कारण आज किसान के सामने अपने मवेशी पालने को लेकर भी एक संकट खड़ा हो गया है ,और सामने जेठ की दुपहरी आने को इंतिजार कर रही है ।

About मैं हूँ गोड्डा

MAIHUGODDA The channel is an emerging news channel in the Godda district with its large viewership with factual news on social media. This channel is run by a team staffed by several reporters. The founder of this channel There is Raghav Mishra who has established this channel in his district. The aim of the channel is to become the voice of the people of Godda district, which has been raised from bottom to top. maihugodda.com is a next generation multi-style content, multimedia and multi-platform digital media venture. Its twin objectives are to reimagine journalism and disrupt news stereotypes. It currently mass follwer in Santhal Pargana Jharkhand aria and Godda Dist. Its about Knowledge, not Information; Process, not Product. Its new-age journalism.

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