सदमे के बाद भी जारी रहा द्रोपदी मुर्मू का संघर्स, कैसे फर्श से अर्श तक का सफर तय कर बनी पार्षद से राष्ट्रपति । – मैं हूँ गोड्डा- maihugodda.com
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सदमे के बाद भी जारी रहा द्रोपदी मुर्मू का संघर्स, कैसे फर्श से अर्श तक का सफर तय कर बनी पार्षद से राष्ट्रपति ।

द्रौपदी मुर्मू ने देश के 15 वे राष्ट्रपति उम्मीदवार के तौर पर जीत दर्ज़ की है। वह देश की दूसरी महिला राष्ट्रपति(Woman president) और आदिवासी समुदाय(Schedule tribe) से पहली महिला राष्ट्रपति के रूप में शपथ(Oath) लेगीं। आज जब द्रौपदी मुर्मू संविधान(Constitution) के सर्वोच्च पद के लिए निर्वाचित हुई हैं। जानिये द्रौपदी मुर्मू ने किन संघर्षो को पार कर हासिल किया ये मुकाम और कैसा रहा उनका राजनीतिक सफर(Political career)…

ओडिशा के मयूरभंज जिले में है पैतृक गांव द्रौपदी मुर्मू का शुरूआती जीवन ओड़िशा(Odissa) के मयूरभंज(Mayurbhanj) जिले के सुदूरवर्ती गांव रायरंगपुर(Rairangpur) में बीता। उन्होंने साल 1979 में भुवनेश्वर के रमादेवी महिला कॉलेज से BA पास करने के बाद करियर की शुरुआत ओड़िशा सरकार के लिए क्लर्क की नौकरी से की। तब वह ऊर्जा एवं सिंचाई विभाग में जूनियर सहायक के तौर पर पदस्थापित थी। इसके बाद वह शिक्षक भी रहीं। उन्होंने रायरंगपुर के श्री अरविंदो इंटिग्रल एजुकेशन एंड रिसर्च सेंटर में मानद शिक्षक के तौर पर पढ़ाया। अब तक उनकी पहचान एक मेहनतकश और संघर्षशील महिला के रूप में बन चुकी थी।

लोकतंत्र के सबसे छोटे पद से सियासी सफर की शुरुआत
द्रौपदी मुर्मू ने अपने सियासी करियर की शुरुआत लोकतंत्र के सबसे छोटे पद वार्ड काउंसलर के तौर पर साल 1997 में की थी। तब द्रौपदी मुर्मू रायरंगपुर नगर पंचायत के चुनाव में वॉर्ड पार्षद चुनी गईं और नगर पंचायत की उपाध्यक्ष बनाई गईं थी। उसके बाद उन्होंने राजनीति में कभी पीछे मुड़कर कर नहीं देखा और वे लगातार आगे बढ़ती चली गईं।

बीजेपी ने रायरंगपुर सीट से दिया टिकट, बनीं विधायक
NDA की प्रत्याशी के तौर पर राष्ट्रपति पद के लिए जीत दर्ज कर चुकी द्रौपदी मुर्मू का बीजेपी से पुराना नाता रहा है। वह रायरंगपुर विधानसभा सीट से बीजेपी के टिकट पर दो बार (साल 2000 और 2009) में विधायक रह चुकी हैं। अपने पहले कार्यकाल में विधायक बनने के बाद वे साल 2000 से 2004 तक नवीन पटनायक के मंत्रिमंडल में स्वतंत्र प्रभार की राज्यमंत्री रहीं। उन्होंने बतौर मंत्री वाणिज्य,परिवहन विभाग और मत्स्य पालन के अलावा पशु संसाधन विभाग में भी अपना योगदान दिया है। उस वक्त नवीन पटनायक की पार्टी बीजू जनता दल (BJD) और बीजेपी ओड़िशा मे गठबंधन की सरकार चला रही थी। हालांकि, BJD और BJP का फिलहाल गठबंधन नहीं है। राज्य में मामला सत्तापक्ष(BJD) और विपक्ष(BJP) का है,फिर भी BJD ने राष्ट्रपति चुनाव में अपना समर्थन BJP समर्थित NDA प्रत्याशी द्रौपदी मुर्मू को दिया।

सादगी और संघर्ष भरा रहा है जीवन, सर्वश्रेष्ठ विधायक के तौर पर सम्मानित
द्रौपदी मुर्मू का जीवन संघर्ष भरा रहा है। साल 2009 में जब वे दूसरी बार विधायक बनीं, तो उनके पास कोई गाड़ी नहीं थी। उनकी कुल जमा पूंजी सिर्फ़ 9 लाख रुपये थी और उन पर चार लाख रुपये की देनदारी भी थी। उनके चुनावी शपथ पत्र के मुताबिक़, तब उनके पति श्याम चरण मुर्मू के नाम पर एक बजाज चेतक स्कूटर और एक स्कॉर्पियो गाड़ी थी। इससे पहले वे चार साल तक मंत्री रह चुकी थीं । उन्हें ओड़िशा में सर्वश्रेष्ठ विधायकों को मिलने वाला नीलकंठ पुरस्कार भी मिल चुका है।

साल 2015 में बनी झारखंड की पहली महिला राज्यपाल
द्रौपदी मुर्मू साल 2015 में झारखंड की राज्यपाल बनाई गई। 18 मई 2015 को उन्होंने झारखंड की पहली महिला और आदिवासी राज्यपाल के रूप में शपथ ली थी। वह छह साल, एक महीना और 18 दिन इस पद पर रहीं। वह झारखंड की पहली राज्यपाल हैं, जिन्हें अपने पाँच साल के टर्म को पूरा करने के बाद भी उनके पद से नहीं हटाया गया। जब उन्हें पहली बार राज्यपाल बनाया गया, उससे ठीक पहले तक वे मयूरभंज जिले की बीजेपी अध्यक्ष थीं। वह साल 2006 से 2009 तक बीजेपी के एसटी (अनुसूचित जाति) मोर्चा की ओड़िशा प्रदेश अध्यक्ष रह चुकी हैं। वह दो बार बीजेपी एसटी मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य भी रह चुकी हैं। साल 2002 से 2009 और साल 2013 से अप्रैल 2015 तक इस मोर्चा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य रहीं। 2015 में झारखंड की राज्यपाल मनोनीत होने के बाद वह बीजेपी की सक्रिय राजनीति से अलग हो गईं।

राज्यपाल के रूप में आदिवासियों के हित के लिए रही मुखर
हाल के सालों में जब कुछ राज्यपालों पर पॉलिटिकल एजेंट की तरह काम करने के आरोप लगने लगे हैं, द्रौपदी मुर्मू ने राज्यपाल रहते हुए खुद को इन विवादों से दूर रखा। उन्होंने इस दौरान लिए गए अपने कुछ फ़ैसलों से बीजेपी गठबंधन की पूर्ववर्ती रघुबर दास सरकार और झारखंड मुक्ति मोर्चा गठबंधन की मौजूदा हेमंत सोरेन की सरकारों को उनके कुछ फ़ैसलों पर पुनर्विचार की नसीहत भी दी। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कुछ विधेयक बिना लाग-लपेट के लौटा दिए थे।

सरकार से पूछा विधेयक का लाभ, लौटाया विधेयक
साल 2017 में झारखंड में बीजेपी के नेतृत्व वाली रघुबर दास सरकार थी। उस वक़्त सरकार ने अदिवासियों की ज़मीनों की रक्षा के लिए ब्रिटिश हुकूमत के वक़्त बने छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम (सीएनटी एक्ट) और संथाल परगना काश्तकारी अधिनियम (एसपीटी एक्ट) के कुछ प्रावधानों में संशोधन का प्रस्ताव तैयार कराया था। विपक्ष के हंगामे और वॉकआउट के बावजूद रघुबर दास की सरकार ने उस संशोधन विधेयक को झारखंड विधानसभा से पारित करा दिया। फिर इसे राज्यपाल की स्वीकृति के लिए भेजा गया। तब राज्यपाल रहीं द्रौपदी मुर्मू ने यह विधेयक बगैर दस्तखत सरकार को वापस कर दिया और पूछा कि इससे आदिवासियों को क्या लाभ होगा। सरकार इसका जवाब नहीं दे पाई और यह विधेयक क़ानून की शक्ल नहीं ले सका। राज्यपाल रहते हुए द्रौपदी मुर्मू ने सभी धर्मो के लोगों को राजभवन में एंट्री दी। उनसे मिलने वालों में हिंदू धर्मावलंबी शामिल रहे, तो उन्होंने मुस्लिम, सिख और ईसाई धर्मावलंबियों को भी राजभवन में उतनी ही इज़्ज़त दी। आज अपने संघर्ष और प्रेणारादायी सफर को पार कर वे देश के सर्व्वोच्च संवैधानिक पद पर पहुंच चुकी हैं।

4 साल के अंदर 2 बेटों और पति की मृत्यु से टूट गई थीं राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, ऐसे सर्वोच्च मुकाम तक पहुंची

द्रौपदी मुर्मू देश के सर्वोच्च पद पर पहुंच गईं। द्रौपदी मुर्मू देश की पहली महिला आदिवासी राष्ट्रपति बनी हैं। आज लोग द्रौपदी मुर्मू की ओर भव्यता भरी निगाहों से देख रहे हैं। कई लोगों को लग रहा है कि एक पार्षद से लेकर देश के सर्वोच्च पद तक पहुंचने वालीं द्रौपदी मुर्मू की किस्मत कितनी अच्छी है लेकिन आप जानकर हैरान रह जाएंगे कि महामहिम राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का जीवन इतना भी सरल और आसान नहीं था। आज जिस द्रौपदी मुर्मू से करोड़ों लोग प्रेरणा ले रहे हैं, कभी वो भीषण डिप्रेशन से गुजरी थीं। चेहरे पर हमेशा एक सादगी भरा मुस्कान रखने वालीं दौपदी मुर्मू की जिंदगी में कभी ऐसा वक्त भी आया था जब वे बेइंतिहा दर्द से गुजरीं। काल के क्रूर हाथों ने उनसे उनके अपनों को छीन लिया।

2010 से 2014 तक 4 साल तक मुश्किल भरा समय
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के लिए साल 2010 से 2014 तक का समय बेहद मुश्किल भरा रहा। इन 4 सालों में राष्ट्रपति ने अपने 2 जवान बेटों और पति को खो दिया। 4 साल में नियमित अंतराल पर घऱ में हुई एक के बाद एक मौत ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को बुरी तरह से तोड़ दिया था। इन 4 सालों में पहले बड़े बेटे की मौत हो गई। कुछ समय बाद छोटे बेटे और फिर पति की मौत हो गई। तारीख थी 25 अक्टूबर 2010। द्रौपदी मुर्मू के बड़े बेटे लक्ष्मण मुर्मू दोस्तों के घर पर किसी पार्टी में गये थे। रात को लौटे तो मां से कहा। मैं थका हूं। मुझे डिस्टर्ब मत करना। ऐसा कहकर लक्ष्मण सोने चले गये। सुबह काफी देर तक दरवाजा खटखटाया गया लेकिन नहीं खुला। बाद में जब दरवाजा तोड़ा गया तो अंदर लक्ष्मण मृत मिले। उस समय राष्ट्रपति के सबसे बड़े बेटे की उम्र महज 25 साल थी। पड़ोसियों और रिश्तेदारों का कहना है कि जब द्रौपदी मुर्मू ने बड़े बेटे को खोया तो बुरी तरह से टूट गईं। 6 महीने तक डिप्रेशन में रहीं। धीरे-धीरे उन्होंने मन को समझा लिया।

2 साल के अंतराल में 2 जवान बेटों को खो दिया था
फिर तारीख आई 2 जनवरी 2012। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के छोटे बेटे बिरंची मुर्मू किसी काम से बाहर गये थे। कुछ देर बाद सूचना मिली कि सड़क हादसे में उनकी मौत हो गई है। उस समय बिरंची मुर्मू महज 28 साल के थे। 2 साल के अंतराल में द्रौपदी मुर्मू ने अपने दोनों जवाब बेटों को खो दिय। आखिरकार 1 अक्टूबर 2014 को द्रौपदी मुर्मू के पति, जिनसे उन्होंने प्रेम विवाह किया था, वे भी चल बसे। उस समय द्रौपदी मुर्मू के पति श्याम चरण मुर्मू की उम्र भी महज 55 साल ही थी।

नियमित रूप से ध्यान लगाकर सदमें से उबरीं थीं
एक के बाद एक पहले 2 बेटों और फिर पति की मौत से द्रौपदी मुर्मू को गहरा सदमा लगा। वे डिप्रेशन में चली गईं। उन्होंने उसी दौरान रायरंगपुर में ब्रह्मकुमारी संस्थान की अध्यक्ष सुप्रिया से पूछा कि मैं क्या करूं। कैसे जीऊं। तब सुप्रिया ने उनको संस्थान के मेडिटेशन सेंटर में आने की सलाह दी। आध्यात्म की शऱण में जाने की सलाह दी। उनकी सलाह मानकर द्रौपदी मुर्मू हर रोज ब्रह्मकुमारी संस्थान जाने लगीं और ध्यान लगाने लगीं। शिव बाबा के ध्यान और उपासना ने उनके मन को शांत किया। कहा जाता है कि द्रौपदी मुर्मू हमेशा अपेन साथ 1 ट्रांसलाइट और शिव बाबा की छोटी सी पुस्तिका रखती हैं। नियमित रूप से ध्यान लगाती हैं।

अपने घऱ को आवासीय विद्यालय में तब्दील कर दिया
द्रौपदी मुर्मू ने बेटों और पति की मौत होने के बाद रायरंगपुर स्थित अपने आवास को आवासीय विद्यालय में बदल दिया है। इस स्कूल का नाम श्याम लक्ष्मण शिपुन उच्च प्राथमिक आवासीय विद्यालय है। यहां बच्चों को मुफ्त शिक्षा दी जाती है। स्कूल परिसर में उनके दोनों बेटों लक्ष्मण और शिपुन तथा पति श्याम चरण मुर्मू की प्रतिमा स्थापित की गई है। हर वर्ष उनकी पुण्यतिथि पर द्रौपदी मुर्मू यहां आती हैं।

देश की 15वीं राष्ट्रपति बनीं पूर्व राज्यपाल द्रौपदी मुर्मू
2014 में झारखंड की राज्यपाल बनने तक द्रौपदी मुर्मू नियमित रूप से ब्रह्मकुमारी संस्थान में जाती रहीं। परिजनों का कहना है कि द्रौपदी मुर्मू हर रोज सुबह साढ़़े 3 बजे उठ जाती हैं। सैर पर जाती हैं और ध्यान लगाती हैं। इसी ध्यान ने उनको मानसिक रूप से मजबूत बनाया। पड़ोसियों और रिश्तेदारों का कहना है कि द्रौपदी मुर्मू बहुत सरल हैं। उनमें अहंकार नहीं है। जब वे झारखंड की राज्यपाल थीं तो राजभवन का द्वार सबके लिए खुला रहता था। वे सबसे मिलतीं और उनकी समस्याओं का निराकरण करतीं। लोगों को उम्मीद है कि राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू भी वैसी ही होंगी।

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05-27-2024 07:01:15×