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भारतीय रेल की ऐसी गाथा आपने कभी नही सुनी होगी ,सुनकर दांतो तले उंगली दबा लेंगे आप ।

अंतराष्ट्रीय/आपने फिल्म ‘चलती का नाम गाड़ी’ का यह गीत ‘जाना था जापान, पहुंच गए चीन, समझ गए न ।’ जरूर सुना होगा । यह गाना भारतीय रेलवे पर बिलकुल सटीक बैठता है ।

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वह कभी-कभी ऐसा कुछ कर बैठती है कि जो बहुत ही अजीबोगरीब होता है । रेलवे से जुड़े ऐसे कई वाकये हैं जिन्हें सुनकर आप दांतों तले अंगुलियां दबा लेंगे ।

रेलवे के कुछ ऐसे ही रोचक और वास्तविक किस्सों से आज हम आपको रूबरू करा रहे हैं । जिसमे ट्रेन को जाना कहीं और था पर पहुंच कहीं और गयी ।

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इतना ही नहीं एक ट्रेन तो अपने निर्धारित समय से चार वर्ष बाद अपने गंतव्य स्थल पर पहुंची ।दरअसल वर्ष 2017 के नवंबर माह में जिस ट्रेन को महाराष्ट्र के कोल्हापुर जाना था वो ट्रेन रेलवे की गलती से मध्य प्रदेश के बानमोर स्टेशन जा पहुंची ।

इस स्पेशल स्वाभिमानी एक्सप्रेस ट्रेन को मथुरा से कोटा होते हुए कोल्हापुर जाना था, उसे ग्वालियर-झांसी रूट पर रवाना कर दिया गया । ट्रेन पहुंचनी थी महाराष्ट्र के कोल्हापुर, लेकिन पहुंच गई मध्य प्रदेश के बानमोर ।

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लगभग 160 किमी की यात्रा के बाद जब यात्रियों ने ट्रेन को बानमोर स्टेशन पर देखा तो जमकर हंगामा किया । यात्रियों ने लगभग ढाई घंटे तक ट्रेन को रोके रखा ।

 

इस दौरान यात्री इंजन के आगे पटरी पर भी लेट गए । हालांकि अपनी इस चूक को छुपाने के लिए रेलवे के जिम्मेदारों का कहना था कि अधिक ट्रैफिक होने की वजह से ट्रेन को इस रूट से निकाला गया ।

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ऑल इंडिया किसान संघर्ष कॉर्डिनेशन कमेटी के नेतृत्व में 20 नवंबर 2017 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन था । इसमें शामिल होने के लिए महाराष्ट्र के दो हजार से अधिक किसान कोल्हापुर किसान यात्रा स्पेशल ट्रेन से दिल्ली आये थे ।

 

धरना खत्म होने के बाद यह ट्रेन दिल्ली के सफदरजंग से वापस कोल्हापुर के लिए रवाना हुई । ट्रेन 21 नवंबर 2017 की रात मथुरा स्टेशन पहुंची ।

 

लेकिन इसके बाद ट्रेन रास्ता भटक गई । जिसके कारण ट्रेन 160 किमी गलत रास्ते पर दौड़ती रही और महाराष्ट्र की बजाए मध्य प्रदेश की सरहद में घुस गई ।

दरअसल मथुरा से इस ट्रेन को ग्वालियर-झांसी रूट पर जाने का सिग्नल दे दिया गया, जबकि इस ट्रेन को मथुरा से कोटा, सूरत, मुंबई और पुणे होते हुए कोल्हापुर जाना था ।

 

 

इसके बावजूद ट्रेन को जिस रूट का सिग्नल मिला, ट्रेन चालक ने उसी रूट पर ट्रेन को दौड़ा दिया ।
रात में तो किसानों को कुछ समझ नहीं आया, लेकिन सुबह लगभग 6.40 बजे ट्रेन जब बानमोर रेलवे स्टेशन से गुजर रही थी तो किसानों को आभास हुआ कि ट्रेन गलत रूट पर जा रही है ।

उन्होंने चेन पुलिंग की कर ट्रेन रोक दी और उसके बाद गार्ड और ड्राइवर के पास पहुंच कर उन्हें बताया कि ट्रेन गलत रूट पर जा रही है । इसके बावजूद भी जब ट्रेन चालक ने ट्रेन चलाने का प्रयास किया तो किसानों ने हंगामा कर दिया ।

 

किसान पटरी पर लेट गए और ट्रेन आगे नहीं बढ़ने दी । इसके बाद आरपीएफ, जीआरपी और रेलवे स्टाफ वहां पहुंचा । इस हंगामे के कारण यह ट्रेन बानमोर रेलवे स्टेशन पर 9.40 बजे तक खड़ी रही । रेलवे स्टाफ, आरपीएफ एवं जीआरपी ने उन्हें किसी तरह शांत कराया और स्टेशन मास्टर की मदद से ट्रेन को ग्वालियर-झांसी रूट से ही कोल्हापुर के लिए रवाना किया गया ।

 

चार वर्ष बाद अपने गंतव्य पर पहुंची ये ट्रेन

ट्रेनों की लेटलतीफी के बारे में तो भारतीय रेलवे का कोई सानी नहीं है । इस मामल्रे में तो वो विश्वविख्यात है । यहां अधिकांश ट्रेनें अपने निर्धारित समय पर कभी नहीं पहुंचती हैं । दो से चार घंटे की देरी होना तो आम बात है ।

 

फिर अगर मौसम जाड़े का हो तो फिर ट्रेनें राम भरोसे ही चलती हैं । कई ट्रेने 20 से 24 घंटे की देरी से अपने गंतव्य पर पहुंचती हैं । लेकिन ट्रेनों की लेट-लतीफी एक ऐसा अजूबा मामला भी है जिसने रेलवे की लेटलतीफी के सारे रिकार्ड ध्वस्त कर डाले ।

यह ट्रेन कुछ घंटे या कुछ दिन और कुछ माह नहीं बल्कि 1275 दिन मतलब लगभग चार वर्ष के विलंब से अपने निर्धारित गंतव्य पर पहुंची । अरे चौंकिए मत जनाब, यह सच घटना है वो भी सोलह आने मतलब शत-प्रतिशत सच ।

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जिस दूरी को नापने में ट्रेनों को 42 घंटे 13 मिनट का समय लगता है, उस दूरी को तय करने एक ट्रेन को लगभग चार वर्ष का समय लग गया । वर्ष 2014 में चली ये ट्रेन इसी वर्ष 2018 में अपने निर्धारित गंतव्य स्थल पर पहुंची ।

एक अंग्रेजी अखबार की रिपोर्ट के मुताबिक ये मामला यूपी के बस्ती जिले का है । जहां वर्ष 2014 में विशाखापट्टनम से खाद लेकर चली रेलवे की मालगाड़ी लगभग चार साल बाद बस्ती रेलवे स्टेशन पहुंची ।

बस्ती रेलवे स्टेशन पर इस मालगाड़ी के पहुंचते ही अफसरों में अफरातफरी मच गई और यह अफरातफरी मचना स्वाभाविक भी था क्योकि मालगाड़ी के वैगन में दस लाख से रुपये से अधिक का माल था ।

 

रेल अफसरों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह थी कि वैगन में लदा माल किसका है और कौन इसका मालिक है,इसकी जानकारी भी उन्हें नहीं थी । ऐसे में स्थानीय रेल अफसरों ने इस बाबत तत्काल अपने आला अफसरों को सूचित किया ।

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सबसे बड़ी बात तो यह रही कि इन चार वर्षों के दौरान वैगन में लदा पचास फीसदी माल बेकार हो चुका था । रेलवे की लापरवाही और गलती के कारण इस बेकार हुए माल का हर्जाना कौन भरेगा इस बाबत अफसर अभी तक किसी नतीजे पर नहीं पहुंचे हैं ।

 

जानकारी के अनुसार 1275 दिन बाद पहुचें इस माल (खाद) को विशाखापट्टनम से एक व्यापारी ने बुक कराया था । वहां (विशाखापट्टनम) से अपने निर्धारित समय के अनुसार ट्रेन में खाद की खेप लादी गई और ट्रेन भी निर्धारित समय पर ही चली थी । मगर रास्ते में ट्रेन लापता हो गई ।

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जिस कारोबारी ने यह खाद की खेप बुक कराई थी उसने कई बार इस मामले की जानकारी रेलवे के आला अधिकारियों को दी, मगर लचर कार्यशैली और लापरवाही के कारण रेल अधिकारियों ने इस मामले को बहुत ही हलके में लिया और इस मामले में कोई कार्रवाई नहीं की । जिस्क्र चलते लगभग चार वर्ष के बाद यह ट्रेन खाद की खेप लेकर बस्ती पहुंची ।

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