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आखिर प्रधानमंत्री को काले रंग से इतना डर क्यों ?

पलामू में 5 जनवरी को होने वाली प्रधानमंत्री की सभा में काले कपड़ों पर ही नहीं काले मोजे-पर्स पर भी प्रतिबंध है, तो क्या पीएम की सुरक्षा में तैनात ब्लैक कमांडो का ड्रेस कोड भी चेंज होगा?

मो.असग़र खान रांची/नव वर्ष और आगामी आम चुनाव के लिए संभावित शेष तीन माह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी पहली सभा की शुरुआत झारखंड की धरती से करेंगे। लेकिन सख्त निर्देशों के साथ। सभा के दौरान प्रधानमंत्री को दूर-दूर तक कोई काला रंग दिखाई ना दें, इसके इंतज़ाम में पुलिस-प्रशासन अभी से ही जुट गया है। क्या गैर, क्या सरकारी, सब सरकार की नजर में एक समान होंगे।
दरअसल, झारखंड के पलामू में पांच जनवरी 2019 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी चियांकि हवाई अड्डा से 2500 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाली उत्तरी कोयल परियोजना (मंडल डैम) का शिलान्यास करेंगे। यहीं से वे एक सभा को 10:30 से 11:30 बजे तक संबोधित भी करेंगे। मगर कार्यक्रम में काले रंग पर जिस तरह की पाबंदी लगाई गई है, उसे लेकर नये सिरे से सियासत शुरू हो गई है।
सरकारी कर्मी को भी मनाही  क्यों?
पलामू एसपी ने 29 दिसंबर 2018 को गढ़वा, पलामू, लातेहार, चतरा के उपायुक्त को पत्र लिखकर कहा है कि सभा में लाए जा रहे लोगों को पूर्व से ही निर्देशित कर दिया जाए कि वे काले रंग कीपोशाक पहन कर ना आएं। पत्र में यह भी लिखा गया है कि मोजे और पर्स तक का रंग काला नहीं होना चाहिए।
इसके अलावा काले रंग की चादर, पैंट, शर्ट, कोर्ट, स्वेटर, मफलर, टाई, जूता आदि या बैग-पर्स लेकर कार्यक्रम सभा स्थल पर सिर्फ आम जनता ही नहीं बल्कि कोई सरकारी कर्मी भी नहीं आएगा। साथ ही सभी कर्मचारियों को सभा में प्रवेश लिए पहचान पत्र को अनिवार्य बताया गया है।

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पत्र में निर्देशित कुछ बिंदुओं पर पलामू उपायुक्त शांतनु अग्रहिर से सवाल
सवालः काले रंग पर इस तरह से पाबंदी लगाए जाने को लेकर गृह विभाग या किसी अन्य विभाग से कोई निर्देश मिला है क्या?
जवाबः सिक्योरिटी के पाइंट ऑफ व्यू से किया गया है।
सवालः तो क्या यह आप लोगों का एक तरीका है या गृह विभाग की तरफ से निर्देश है?
जवाबः जो भी सिक्योरिटी के पाइंट ऑफ व्यू चीजे हैं वो क्लियर हैं।
सवालः क्या वहां आने वाली गाड़ियां भी ब्लैक नहीं होनी चाहिए?
जवाबः ऐसा नहीं है। गाड़ियों के लिए ऐसा कुछ नहीं है।
सवालः प्रधानमंत्री, सीएम, गवर्नर की सुरक्षा में तैनात ब्लैक कमांडो के ड्रेस कोड चेंज रहेंगे क्या?
जवाबः देखिए, दो चीज़  हैं। सिंपल सी बात है, जो चीजें नॉर्मल ड्रेस कोड में हमलोगों के, वो वैसा ही है। कोई पब्लिक इस मौके का अपने ग्रीवांस के मुताबिक इवेंट का यूज ना करें इसलिए एक एडवाइजरी जारी की गई है। ब्लैक कैट कमांडो ब्लैक ड्रेस में रहेंगे, नहीं रहेंगे ये अदर वाइज वाली बाते हैं। उसको आप उसी सेंस में लीजिए, इसके सेंस को चेंज नहीं किया जाए।
सवालः पत्र में लिखा है कि सरकारी कर्मी भी ब्लैक मोजा-पर्स का इस्तेमाल नहीं करेंगे,  इसपर आप क्या कहेंगे?
जवाबः सरकारी कर्मी के लिए ऐसा कुछ नहीं है, लेकिन वे ब्लैक ड्रेस में नहीं रहेंगे। अगर कोई कर्मी ब्लैक कोट पहनता है तो वो उस दिन दूसरे कलर का कोट पहनेगा।
(चूंकि ऐसे पत्र पलामू पुलिस अधीक्षक इंद्रजीत महथा की ओर से जारी किए गए थे  इसलिए मैंने उनसे ही इन प्रश्नों का उत्तर जानना चाहा। लेकिन कई कॉल करने और मैसेज के बाद भी उधर से कोई रिप्लाई नहीं आया तो पलामू उपायुक्त से इन सवालों का जवाब लेना पड़ा।)
सुरक्षा के नाम पर अपमान!
वरिष्ठ पत्रकार सुरजीत सिंह कहते हैं, “काले रंग पर इस तरह के बैन का क्या मतलब है! लोकतंत्र में सहमत के समान ही असहमति का भी स्थान है। उसी  तरह विरोध-प्रदर्शन भी लोकतांत्रिक अधिकार है।”
आगे वो कहते हैं “इसे नकार नहीं सकते हैं कि एक बड़े तबके में सरकार को लेकर काफी आक्रोश है। सरकार अगर दावा करती है कि राज्य की सवा तीन करोड़ जनता का उसने विकास किया है तो फिर विरोध की आशंका क्यों? ये नौबत क्यों आ पड़ी कि इस तरह से काले रंग को बैन करना पड़ रहा है?”
एक तरफ प्रशासन इसको सुरक्षा व्यवस्था की कड़ी बता रहा है, तो विपक्ष इसके राजनीतिक मायने निकाल रहा है।
ऐसा कोई निर्देश सरकार के किसी विभाग से दिया गया है, उपायुक्त ने यह स्पष्ट नहीं किया। और न ही यह तरीका जिला प्रशासन का है। दो बार इस बाबत प्रश्न करने पर उपायुक्त सिर्फ सुरक्षा की दृष्टिकोण से किए इंतज़ाम की ही बात कहते हैं।
इसपर, झारखंड कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. अजय कुमार कहते हैं, “इसी सरकार में विरोध के स्वर को दबाने की प्रवृति जोर-शोर से पनपी है। लोकतंत्र में काला झंडा दिखाने का हर एक को अधिकार है, अब चाहे वो आम नेता हो या प्रधानमंत्री।”
प्रशासन के इस निर्देश को अजय कुमार बकवास और अलोकतांत्रिक बताते हैं। वे कहते हैं, कल कहिएगा कि लाल, पीला या हरा रंग का कपड़ा नहीं पहनना है। तमाशा बना दिया गया है।
झारखंड मुक्ति मोर्चा का मानना है कि सिक्योरिटी के नाम लोगों को अपमानित किया जा रहा है। पार्टी नेता विनोद पांडे कहते हैं, सरकार पारा शिक्षकों से डरी हुई है। भारतीय जनता पार्टी को काला कपड़ा ही, नहीं काले रंग के व्यक्ति से भी दिक्कत है।
झारखंड भाकपा माले के सचिव जनार्दन प्रसाद इसे जनता का सरकार पर प्रेशर बताते हैं। वे कहते हैं कि जनता का जो गुस्सा प्रधानमंत्री को लेकर बढ़ा है, उसी के विरोध प्रदर्शन से बचाने की यह कवायद है।
सत्ता पक्ष की चुप्पी क्यों?
इधर पत्र में दिए गए निर्देश को लेकर सोशल मीडिया पर भी प्रतिक्रिया जारी है। फेसबुक यूजर्स सुधीर पाल लिखते हैं, “हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं।” अमित मिश्रा लिखते हैं, “जिनका वर्ण ही श्याम हो वो क्या करें।”
लेकिन सोशल मीडिया पर सक्रिय रहने वाली झारखंड भाजपा की प्रवक्ता मिसफिका हसन को पत्र में दिए गए निर्देश की जानकारी नहीं है।
वे काले रंग पर लगाए गए बैन को सुरक्षा की दृष्टिकोण से देखती हैं और विपक्ष को भी यही सलाह देती हैं।
सरकारी और विभागीय कर्मी को भी मोजा और पर्स तक ब्लैक नहीं रखने को कहा गया है, पार्टी इसे कैसे देखती है?
इस प्रश्न पर मिसफिका कहती हैं, उन्हें इस बात की जानकारी नहीं है कि ऐसा कोई पत्र जारी हुआ। क्या है, नहीं है, देखना पड़ेगा।
हालांकि झारखंड सरकार के मंत्री सरयू राय के मुताबिक उन्हें इस बात की जानकारी अखबारों के माध्यम से मिली है, मगर उन्होंने इस विषय पर कुछ भी बोलने के मना कर दिया।
वरिष्ठ पत्रकार फैसल अनुराग बताते हैं, “मैंने पत्रकारिता करते हुए इंदिरा गांधी से लेकर अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह तक को देखा है। ये लोग विरोध प्रदर्शन को देख-सुन सुलझाया करते थे। लेकिन आज दबाया जा रहा है। माहौल मानो ऐसा है जैसे भीतर से कोई बहुत डरा हुआ हो, और वो लोगों को भी डरा रहा हो। आप इसे तानाशही कह सकते हैं।”
पारा शिक्षकों के प्रदर्शन का डर?
वहीं माना ये भी जा रहा है कि राज्य के आंदोलनकारी पारा शिक्षक कहीं फिर से विरोध-प्रदर्शन न कर दें। राज्य स्थापना दिवस के मौके पर पारा शिक्षकों द्वारा किए विरोध प्रदर्शन को लेकर पुलिस-प्रशासन पहले से ही काफी सतर्क दिख रहा है। और जारी किए पत्र को भी इसी कड़ी में देखा जा रहा है।
पारा शिक्षक नेता बजरंग प्रसाद ने एक वीडियो जारी कर कहा है कि चार जनवरी 2019 तक सीएम रघुवर दास हमारी मांगे पूरी नहीं करते हैं तो राज्य के पारा शिक्षक प्रधानमंत्री के कार्यक्रम का विरोध करेंगे। हालांकि बाद में बयान के बारे में पूछे जाने पर बजरंग प्रसाद ने खंडन कर दिया और किसी भी तरह के दबाव की बात से इंकार किया।
छत्तीसगढ़ मॉडल की तर्ज पर झारखंड में सीधे समायोजित किए जाने की मांग को लेकर राज्य के 67,000 पारा शिक्षकों की हड़ताल बीते 47 दिनों से जारी है। 14 लोगों की जान जा चुकी है और कई को जेल भी जाना पड़ा। पर अभी तक इनकी मांगों को लेकर सरकार की तरफ से कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है।
झाविमो विधायक व पूर्व शिक्षा मंत्री प्रदीप यादव का कहना है कि पारा शिक्षकों का आंदोलन जन आंदोलन में तब्दील हो गया है। सरकार को उनकी मांगे माननी होंगी।
बैन के सवाल पर वे कहते हैं कि विरोध के कई तरीके हैं। काला झंडा दिखाकर विरोध प्रदर्शन करना भी उनमें से एक है। और यह गांधीवादी तरीका है। सरकार को विरोध के कारणों को ढूंढना चाहिए कि जनता किन कारणों से दुखी है। अब अगर सरकार को पुलिस-प्रशासन से भी भय है तो उन्हें सत्ता में बने रहना कोई हक नहीं है। मेरा मानना है कि राज्य में भारतीय जनता पार्टी के कई नेताओं का रंग बहुत काला है। तो क्या कार्यक्रम में उनकी इंट्री पर भी रोक लगाई जाएगी?

साभार :न्यूज क्लिक

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