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आखिर किसके आगे मजबूर है ये इंसान ..?

मेहनत या किस्मत ?

अक्सर आम जनजीवन में ये बहस का मुद्दा बनता है लेकिन ज्यादातर लोग मेहनत को ही सही मानते है भले उनकी सफलता किस्मत के घोड़े पर सवार होकर ही क्यों ना पूरी हुई हो !मेहनत को सभी सर्वोपरि मानते है लेकिन किस्मत को साथ में ही रखते है.बिना किस्मत के मेहनत भी काम नहीं आती है क्यूंकि दिन भर कड़ी मेहनत करने वाला मजदूर भी दो जून की रोटी नहीं खा सकता है. पूरी जिंदगी चोरी या भ्रष्टाचार में लिप्त इंसान भी मजबूत किस्मत के कारण ही नहीं पकड़ा जाता है जबकि कुछ लोग मुफ्त में ही धरा जाते है. कुछ लोग किस्मत को बदलने के लिए पुरजोर मेहनत भी करते है लेकिन किस्मत ऐसी बलशाली होती है सारी की सारी मेहनत धरी की धरी रह जाती है. ऐसी ही एक कहानी किस्मत के मारे 80 वर्षीय अमिन दास की है जिसने अपनी मेहनत से किस्मत बदलने की भरसक प्रयास किया लेकिन किस्मत तो किस्मत है. सारी की सारी मेहनत बेकार हो गयी जब किस्मत ने अपनी चाल चलनी शुरू की!
गोड्डा प्रखंड के नेपुरा पंचायत के परासी गाँव का अमिन दास पिछले सात दिनों से सदर अस्पताल में अपने 8 साल के बच्चे के इलाज़ के लिए परेशान है. उसका बच्चा गणेश दास के सारे शरीर में चर्म रोग हो गया है. जन्म के 2 साल के बाद उसे ये बीमारी हो गयी थी. जिस उम्र का उसका बेटा है अब तक उस उम्र में उसका पोता होता लेकिन यही है किस्मत!

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शादी के कई साल के बाद भी उसे बच्चा नसीब नहीं हुआ. कुछ लोग गाँव में उसे ताना भी मारते की औलाद तेरी किस्मत में नहीं है लेकिन वो चुप चाप सहता था. कई सालों के बाद उसकी पत्नी की मौत हो गयी बाद में उसने दूसरी शादी कर ली. उस शादी के बाद उसे बेटा हुआ फिर कुछ साल के बाद एक बेटी और फिर बेटा.अपने परिवार को सवारने के लिए वो जी तोड़ मेहनत करता था लेकिन पिछले साल किस्मत ने फिर मारी पलटी और उसका 22 साल का जवान बेटा खून की कमी के कारण मर गया. बुढ़ापे में ये सहन करना भी बहुत कष्टकारी था लेकिन अपनी छोटे-छोटे बच्चों को देखकर गम भूलने का प्रयास करने लगा. छोटे बेटे की बीमारी अब बढ़ने लगी. अब उसे चलने,खाने और बोलने में भी तकलीफ होने लगी. एक बार फिर कुंवर सिंह की 80 साल की जवानी के किस्से से प्रेरित होकर अपने बेटे की जिंदगी की खातिर मेहनत कर रहा है. सदर अस्पताल गोड्डा जो रेफरल अस्पताल के नाम से भी जाना जाता है क्यूंकि यहाँ सबसे आसान और सुलभ काम रेफर करना ही होता है इसीलिए उसे रिम्स रांची रेफर कर चूका है.
छोटे बेटे की बीमारी अब बढ़ने लगी. अब उसे चलने,खाने और बोलने में भी तकलीफ होने लगी. एक बार फिर कुंवर सिंह की 80 साल की जवानी के किस्से से प्रेरित होकर अपने बेटे की जिंदगी की खातिर मेहनत कर रहा है. सदर अस्पताल गोड्डा जो रेफरल अस्पताल के नाम से भी जाना जाता है क्यूंकि यहाँ सबसे आसान और सुलभ काम रेफर करना ही होता है उसे रिम्स रांची रेफर कर चूका है.
इस 80 साल की उम्र में बिना किसी की सहायता से 8 साल के बच्चे का इलाज़ रांची में करवाना ये एक कठिन चुनौती है लेकिन वो मेहनत से भाग नहीं रहा है लेकिन यहाँ भी उसके पीछे उसकी किस्मत ही लगी हुई है क्यूंकि रांची में गरीब,लाचार और बीपीएल रेखा से नीचे रहने वाला अमिन दास कैसे अपने बेटे का इलाज़ करवाएगा?
अब अगर उसके बेटे का इलाज़ होगा भी तो किसी रहमदिल इंसान के कारण ही क्यूंकि सारे मेहनत के बाद भी उसका इलाज “किस्मत” पर ही निर्भर करता है.
पेट्रोल पम्प पर काम करने वाले धीरू भाई अम्बानी पेट्रोल कम्पनी के मालिक बन गए ये उनकी किस्मत के साथ मेहनत थी जबकि उनके तरह पम्प में नौजल पकड़ने वाला इंसान पेट्रोल पम्प में गद्दी में बैठ कर गल्ला भी नहीं पकड़ सकता है,और खुदा को प्यारा हो जाता है.
अगर इस खबर को पढ़ने के बाद दिल से कोई आवाज निकले तो सीधे सदर अस्पताल के पुरुष वार्ड में खुद से जाकर मदद कर सकते है वरना आगे तो उसकी किस्मत है ही ।

अभिजीत तन्मय की ख़ास रिपोर्ट 

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