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नोटा का डर दिला गया सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण ।

नोटा बनाम आरक्षण

अभिजीत तन्मय/ पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने एस टी/एस सी कानून में बदलाव किया जिस कारण सरकार घिर गई और पूरे देश मे विरोध के कारण अंततः सरकार को अध्यादेश लाकर इस कानून को पज़ीर से बहाल करना पड़ा। सरकार के इस निर्णय से सवर्णों में काफी रोष रहा जिसका फायदा विपक्ष की दलों ने उठाया। पिछले चुनाव में इसका खामियाजा भी भाजपा को उठाना पड़ा जब तीन राज्य जहां उनकी सरकार थी वो भी हार गए। दो राज्य में तो मिट्टी पलीद हो गयी।
इस हार का मुख्य कारण सवर्णों का सरकार के खिलाफ खड़ा हो जाना और नोटा का बटन दबाने के कारण हुआ।
कई ऐसी सीट जो भाजपा हार गई उसमे हार के अंतर से ज्यादा नोटा का वोट था। यही कारण था कि सरकार अब कोई रिस्क नही लेना चाह रही है।

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सवर्णों का वोट सबों को चाहिए इसी कारण केंद्र सरकार ने आज कैबिनेट की बैठक में आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को 10% आरक्षण देने की घोषणा की।
ये एक मास्टरस्टोक है क्योंकि अभी विपक्षी भी इस घोषणा का विरोध नही कर पाएंगे।
मोदी जी ने चुनाव जीतने के बाद शपथ लेते ही कहा था कि चार साल राष्ट्रनीति और एक साल राजनीति।
इस घोषणा को उसी से जोड़ कर देखा जा रहा है।
आर्थिक रूप से कमजोर सवर्णों को आरक्षण देने की चुनावी घोषणा कई वर्षों से चली आ रही थी लेकिन आज इसे अमलीजामा पहनाया गया।

बता दें कि 2018 में SC/ST एक्ट को लेकर जिस तरह सरकार ने मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट दिया था, उससे सवर्ण खासा नाराज बताया जा रहा था। माना जा रहा है कि मंगलवार को मोदी सरकार संविधान संशोधन बिल संसद में पेश कर सकती है। बता दें कि मंगलवार को ही संसद के शीतकालीन सत्र का आखिरी दिन है।

मोदी सरकार ये आरक्षण आर्थिक आधार पर ला रही है, जिसका अभी संविधान में व्यवस्था नहीं है। संविधान में जाति के आधार पर आरक्षण की बात कही गई है, ऐसे में सरकार को इसको लागू करने के लिए संविधान में संशोधन करना होगा। सरकार के इस फैसले को लोकसभा चुनाव से जोड़ते हुए देखा जा रहा है।

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सियासी विश्‍लेषकों के मुताबिक सपा-बसपा ने यूपी में अपने चुनावी गठबंधन में कांग्रेस को रणनीति के तहत शामिल नहीं करने का फैसला किया है. उसके पीछे बड़ी वजह मानी जा रही है कि बीजेपी के सवर्ण तबके में बंटवारे के लिहाज से कांग्रेस और सपा-बसपा अलग-अलग चुनाव लड़ने जा रहे हैं ताकि सवर्णों का वोट बीजेपी और कांग्रेस में विभाजित हो जाए. लेकिन लंबे समय से गरीब सवर्णों के लिए आरक्षण की मांग के चलते इस घोषणा से बीजेपी को सियासी लाभ मिल सकता है।

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