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फ़िल्म समीक्षा : “संजू” कितनी सच्चाई, कितनी हकीकत ?

संजय दत्त पर बनी “संजू” कितनी सच्चाई कितनी हकीकत ?

एक नया ट्रेंड चला है इन दिनों, बायोपिक बनाने की ख़बर उड़ाने का। ख़बर ही क्योंकि हाल-फिलहाल की हर बायोपिक में नायक को छोड़कर बाकी सब कुछ अदला-बदला सा होता है। दंगल, एयरलिफ्ट, टॉयलेट वगैरह इसके उदाहरण हैं।

खैर हम कहानी पर आते है। फ़िल्म की शुरुआत संजय दत्त और उनपर लिखी बायोग्राफी से होती है, जिसे संजय बाइज़्ज़त जला देते हैं। उन्हें तभी ख़बर मिलती है कि उन्हें जेल जाना होगा। यहाँ वो विनी (अनुष्का) नामक राइटर को अपनी आधी स्टोरी सुनाते हैं। जिसमें ड्रग्स, लड़कियां, माँ यानी नर्गिस (मनीषा कोइराला) का कैंसर, बाप (परेश रावल) से नफरत और उनका दोस्त कमली। (विकी कौशल)
इंटरवल तक पिक्चर अच्छी रफ्तार में रहती है, अचानक से आए गाने चुभते नहीं है। इंटरवल के बाद संजय और मुम्बई बम कांड के मुद्दे पर रोशनी डाली है। यहां संजय के अंडरवर्ल्ड के रिश्तों को ‘डर’ नाम देकर जस्टिफाई किया है और संजय को उनसे अलग होते भी दिखाया है। AK 56 को रखने की बात इतनी मासूमियत से दिखाई है कि दर्शक आसानी से संजय को विक्टिम समझ लें। फ़िल्म एक ज़ोरदार सस्पेंस के खुलने के बाद ख़त्म होती है और सीट से उठते वक़्त दर्शकों के चेहरे पर स्माइल रह जाती है।

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संजय की मूल कहानी से उतना ही मसाला उठाया है जितने पर बवाल न हो सके। चारों तरफ से सेफ फील करने के बाद ही ये फ़िल्म रिलीज़ की गयी है। उदाहरण: दाऊद का नाम नहीं लिया क्योंकि वो एक्टिव है। हाजी मस्तान का ज़िक्र है। टाइगर मेमन का ज़िक्र है, छोटा राजन का नहीं। बाला साहब ठाकरे को मिस कर दिया, मुंडे भाऊ करके कोई लोकल गुंडा दिखा दिया। न माधुरी दिखाई न पहली दोनों बीवियां। टीना के नाम पर रूबी (सोनम कपूर) का छोटा सा रोल दिखाकर संजय का पूरा करैक्टर बता दिया।

एक्टिंग – रनबीर की एक्टिंग अच्छी है। पर गेटअप का प्रभाव बहुत ज्यादा है। कई एक मौके हैं जहाँ रणबीर संजू से निकल कर वापस रणबीर बन गए और उनकी एक्टिंग में ज्यादा निखार आ गया है। विकी कौशल जबरदस्त हैं। उनके सदके ह्यूमर का तड़का भी घोला गया है। सोनम का रोल बहुत छोटा है पर ठीक है। करिश्मा तन्ना जिसे लोग माधुरी समझ रहे थे, उसका कैमियो रोल है। बोमन ईरानी का होना लाज़मी था, उनका कैमियो ही सही पर अच्छा रोल है। जिम सरभ हमेशा की तरह गे जैसे लगे हैं पर एक्टिंग अच्छी है। उन्हें सलमान समझकर देखने की भूल न करें। अब परेश रावल यानी दत्त साहब। सुनील दत्त के रोल के लिए बिलकुल मिसफिट थे। पर परेश की एक्टिंग इतनी जबरदस्त है कि वो संभाल ले जाते हैं। मनीषा सरप्राइज पैक हैं इस फ़िल्म का, उनसे बेहतर नर्गिस का रोल कोई निभा ही नहीं सकता था। दिया मिर्ज़ा रोने और घूरने के काम आई हैं। गेटअप की वजह से वो भी मान्यता लगती हैं। रणबीर के लिए फिर लिखूंगा कि अच्छी एक्टिंग की उन्होंने, पर गेटअप का बहुत बड़ा योगदान रहा।

म्यूजिक – बैकग्राउंड स्कोर अच्छा है। रूबी-रूबी गाना रहमान ने कंपोज़ किया है, पर वो मज़ेदार बात नहीं है जिसके नगाड़े रहमान साहब बजाते हैं। फिर भी ठीक है। बुरा नहीं लगता। मैं भी बढ़िया तू भी बढ़िया अच्छा गाना है। रोहन ने इसका म्यूजिक दिया है सोनू और सुनिधी ने बिलकुल रेट्रो स्टाइल गाया है। कर हर मैदान फतेह में सुखविंदर की आवाज़ बहुत जची है। साथ श्रेया घोषाल ने मिश्री घोली है।

डायरेक्शन स्क्रीन प्ले – इस फ़िल्म में अगर कुछ सबसे ज्यादा नोट करने के काबिल है तो वो राजकुमार हिरानी का डायरेक्शन ही है। स्क्रिप्ट पर बहुत मेहनत की गई है। मेहनत इसलिए भी ज्यादा हुई है क्योंकि असल कहानी से अलग हटके ले जाना था। राजू हर मोर्चे पर बाजी मारते हैं। क्लाइमेक्स तक सस्पेंस बरकरार रखना हो या कहानी में ट्विस्ट लाना, राजू इस बेस्ट।

इस फ़िल्म को थोड़ा और छोटा किया जा सकता था। ढाई घण्टे की भी होती तो अच्छी रहती। लेकिन इमोशन्स को पकाने के चक्कर मे सीन बड़े होते गए। दत्त और संजू जहाँ भी स्क्रीन शेयर करते दिखे, गजब दिखे। रणबीर बहुत अच्छे एक्टर हैं पर ट्रेजडिक और इमोशनल रोल्स में सीमित हैं। दंगल की तरह ये भी बायोपिक न होकर एक आम फ़िल्म है, जिसमें इत्तेफ़ाक़ से नायक का नाम संजू है और उसके बाप का नाम सुनील दत्त। फ़िल्म की एक वाइटल मिस्टेक है ‘वास्तव’ का ज़िक्र न करना। जबकि वो पहली और आखिरी फ़िल्म थी जब संजय को फ़िल्म फेयर अवार्ड लीड एक्टर के लिए मिला था।

फ़िल्म की आखिरी वर्डिक्ट यही है कि फ़िल्म एंटरटेनिंग है। सपरिवार देखने जाएंगे तो मज़ा आएगा। पर ध्यान रखे बच्चे या तो इतने बड़े हों कि डबल मीनिंग समझ सकें, या इतने छोटे हों कि कुछ न समझ सकें। फ़िल्म में बेवजह कुछ आपत्तिजनक शब्द और घटनाएं हैं जो A सर्टिफिकेट दिलवा सकती थीं।

क्यों न देखें? – संजू की सच्ची कहानी जानने का कीड़ा है तो उनकी बायोग्राफी पढ़ें। देखने से बचें। फ़िल्म की लेंथ भी शायद खल जाए।

बाकी जब भी जाना देखने, कंधे झुका के जाना। बाबा का स्टाइल है।

राघव मिश्रा

 

 

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