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नवरात्री विशेष :दोनों हाथ नहीं पर सफलता जिनके कदम चूमती है: आदिशक्ति का अनन्य रूप कामिनी श्रीवास्तव ।

राष्ट्रीय से लेकर कई राज्य पुरुस्कारों से सम्मानित हैं कामिनी श्रीवास्तव

नवरात्रि,साल के वो 9 दिन जब हम संसार को रचने वाली आदि शक्ति मां जगदम्बा के अलग-अलग रूपों की आराधना करते है।नवरात्रि स्पेशल के इस सेगमेंट में हम आपको समाज में मौजूद शक्ति के नौ अलग-अलग रूपों से रूबरू कराएंगे।नवरात्र के दिनों में पूजे जाने वाली सभी देवियों के रूप की प्रतिमूर्ति हमारे समाज में मौजूद हैं ।

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शारदीय नवरात्र का पहला दिन मां कुष्मांडा को समर्पित है।जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, तब इन्हीं देवी ने ब्रह्मांड की रचना की थी। ये ही सृष्टि की आदि-स्वरूपा, आदिशक्ति हैं। इनका निवास सूर्यमंडल के भीतर के लोक में है। वहां निवास कर सकने की क्षमता और शक्ति केवल इन्हीं में है। इनके शरीर की कांति और प्रभा भी सूर्य के समान ही दमकता हैं।वर्तमान समय में ऐसे ही चमकीले स्वरुप का प्रतीक कामिनी श्रीवास्तव हैं।बाल विकास परियोजना अधिकारी के पद पर काकोरी लखनऊ में कार्यरत कामिनी श्रीवास्तव ने बचपन में हुए हादसे में अपने दोनों हाथों के साथ-साथ बाएं पैर की पाचों की उन उंगलियां भी खो दी थी। छोटी-सी उम्र में इतने बड़ें हादसे का शिकार होने के बावजूद भी उन्होंने निराशा के बादलों को अपनी चमक पर हावी नहीं होने दिया।

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कामिनी श्रीवास्तव एक ऐसा नाम जिससे शायद कई लोग अनजान होंगे पर ये नायिका हैं अपनी कहानी की।सन 1962 में उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में जन्मी कामिनी श्रीवास्तव के पिता रेलवे में ड्राईवर थे।वह कुछ चार साल की रही थी जब शंटिंग कर रहें इंजन के बीच में गिर गई।इस हादसे ने कामिनी श्रीवास्तव की पूरी ज़िन्दगी बदल कर रख दी थी।

 

हर बार जब वो निराश होती तो उनके परिवार वाले,उनकी हिम्मत बढ़ाने का काम करते।कामिनी श्रीवास्तव बताती हैं की-“अपने समय में फूटबाल और जिमनास्टिक के चैंपियन रह चुके पिता ने 26 जनवरी के दिन 18 मिनट तक पतले तार पर चल कर दिखाया।ताकि मुझे प्रेरणा मिल सके,अपनी कमजोरियों को अपनी ताक़त में बदल पाने की”।वो कहते हैं न ‘हिम्मत-ए-मर्दा तो मदद-ए-खुदा’।

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वर्ष 1994 में राष्ट्रपति शंकर दयाल से राष्ट्रीय पुरस्कार और और वर्ष 1997 में राज्यपाल रोमेश भंडारी से राज्य स्तरीय पुरस्कार से सम्मानित होने वाली कामिनी श्रीवास्तव ने नौकरी के साथ-साथ अपनी पढ़ाई भी जारी रखी।साहित्य और शिक्षा के प्रति उनकी रूचि और निष्ठा से प्रभावित हो कर उनके विभाग ने उन्हें साल 2000 में इंदिरा महिला स्वयं सहायता समूह योजना के अंतर्गत अध्यान के लिए इंडोनेशिया भी भेजा था।

उपलब्धियों की है लम्बी लिस्ट

कामिनी श्रीवास्तव कहती हैं अपने भय पर विजय पाना उनके लिए सबसे बड़ी उपलब्धि है।पिता की सीख से प्रेरित हो कर सफलता की ऊचांइयों को चूमने वाले कामिनी कहती है की परिवार चाहे वो ससुराल हो या मायका,मेरी सफलता का असली हकदार है।

कई राष्ट्रीय और राज्य स्तरीय पुरस्कारों से सम्मानित हो चुकी कामिनी श्रीवास्तव को वरिष्ट साहित्यकार लक्ष्मीकान्त वर्मा ने साल वर्ष 1994 में भारत भारती पुरस्कार से सम्मानित किया था।साल 1993 में पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने भी वे वेदांग पुरस्कार समारोह और 2005 में मुलायम सिंह द्वारा सम्मानित किया जा चुका है।

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साहित्य के क्षेत्र उत्कृष्ट कार्यों के लिए इन्हें सृजन सम्मान अवार्ड,जूनून अवार्ड,निर्मला साधना सम्मान,मां सावित्री बाई फुले अवार्ड और इनकी रचना ‘खिलते फूल महकता आंगन’ के लिए रामधारी दिनकर अवार्ड से सम्मानित किया जा चुका है।इसके साथ ही साथ पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी साल 2016 में कामिनी श्रीवास्तव को उनकी प्रबल इच्छाशक्ति और आदमी साहस के लिए रानी लक्ष्मी वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया था।

परिवार ही है सब कुछ

कामिनी श्रीवास्तव कहती हैं वो समय जब में उस हादसे के वजह से खुद को छोटा महसूस करने लगी थी,तब मेरा परिवार था जिसने मुझे चलना सिखाया।

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पिता घर से डोली में बैठ जब ससुराल आए तो मन में भय तो था पर पति के स्नेह और ससुराल वालों के सपोर्ट से वो भी दूर हो गया।पति(स्वतंत्र कुमार) अपने नाम के जैसे ही स्वंतंत्र विचार वालें हैं।जीवन में सब कुछ उस वक्त आसान हो जाता है जब आपकी सोच और इच्छाशक्ति एक दुसरे में सामंजस्य बैठा ले।

हम अक्सर मुश्किल समय में टूट जाते हैं,जबकि वो पल जीवन में आते ही हमें निखारने के लिए हैं।इंसान प्रेरणा की तलाश में भटकता फिरता है इस बात से अनजान की जो वो खोज रहा है वो उसके भीतर ही कहीं दबा है।

 

नवरात्र के चौथे दिन मां कुष्मांडा की सच्ची साधना यहीं होगी की लोग अपने अंदर छुपे तेज को बाहर निकाल पाएं,और विश्व में अपने ओज से कीर्तिमान स्थापित कर सकें।

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