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रक्षाबंधन की कहानी : और अंत मे लौट आया वो

कहानी

सारा दिन घर के काम करो और फिर इन लोगों की बातें भी सुनों। अपना सामान खुद नहीं संभालना होता और जब गुम हो जाए तो मुझ पर आ कर रौब जमाओ।

पता नहीं मेरी किस्मत में ही गुलामी लिखी है, शादी हुई तो सास ससुर की गुलामी, बाहर आ गये तो इनके पिता की गुलामी और अब इन बच्चों की गुलामी। ऐसे ही एक दिन मर जाउंगी।” सरिता आज सुबह से ही झुंझलाई हुई थी।

बेटे आशीष ने एक बार ही तो कहा था कि ‘मां मेरी साईंस की बुक नहीं मिल रही।’ तब से सरिता घर के कोने कोने में ढूंढ रही है और साथ में यही सब बड़बड़ा रही है।

गीतिका और आशीष एक दूसरे की तरफ सवालिया नजरों से देखते हुए ये पूछने की कोशिश कर रहे थे कि आखिर आज मां को हो क्या गया।

सरिता बहुत हंसोड़ किस्म की महिला है। बच्चे कितने भी उदास क्यों न हों वो कुछ देर में ही उन्हें हंसा देती है। पति ऑफिस से कितनी भी टेंशन समेट कर लाये हों मगर मजाल है कि सरिता के रहते हुए एक भी टेंशन घर में घुस सके। मगर आज न जाने क्यों वो अपने स्वभाव से एकदम उल्टा व्यव्हार कर रही थी। बच्चे इसीलिए परेशान थे।

“मां, ये रही बुक। ड्राईंग रूम में टेबल पर ही पड़ी थी।” आठ साल की गीतिका ने मां के मूड को भांप कर डरते हुए कहा।

“हम्म, ठीक है, भईया को दे दो।” गीतिका का सहमा चेहरा देख सरिता को अहसास हुआ कि वो बच्चों पर बेफिजूल में ही गुस्सा कर रही है।

फेसबुक पर अपने मन की हर छोटी बड़ी बात लिखने वाली सरिता ने आज एक बार भी फोन को हाथ नहीं लगाया था। आफिस जाते हुए अपने पति गोपाल को भी अच्छे से नहीं बुलाया था सरिता ने, बस नाशता और टिफिन दे कर अपने काम में लग गयी थी। गोपाल सब समझता था इसीलिए चुपचाप ऑफिस के लिए निकल गया ।

सरिता को अहसास हो गया था कि उसने अति कर दी है इसीलिए वो खुद को थोड़ा शांत करने की कोशिश कर रही थी। मगर न जाने क्यों आज उसका मन उस बेकाबू आग की तरह धधक रहा था जिसका खुद पर कोई जोर नहीं चल रहा था।

अभी अभी उसने सोचा कि आज उसने सबका मन खराब किया है इसलिए वो रात के खाने में सबके पसंद की डिशिज बनाएगी जिससे सब खुश हो जाएं। बच्चे अपने कमरे में बैठे पढ़ रहे थे। सरिता अपने मन को शांत करने की कोशिश करते हुए खाना बनाने में लग गई। कुछ पुराने खयाल उसके जहन को इस तरह खरोंच रहे थे कि उसकी आंखों में न चाहते हुए भी दर्द भर आया था।

वो बुरी तरह चिल्ला कर रो देती इससे पहले ही दरवाजे की घंटी बजी। आशीष ने दरवाजा खोला तो सामने कोई अंजान सा चेहरा हाथ में चमचमाता बॉक्स लिए खड़ा था।

“तुम आशू हो ना ?” उस अंजान चेहरे पर सजे खुबसूरत होंठों ने मुस्कुराते हुए पूछा।

“जी हाँ, पर आप कौन ?” आशीष ने थोड़े आश्चर्य के साथ कहा।

“पहचाना नहीं ? चलो कोई बात नहीं आपकी मम्मी याद दिला देंगी कि मैं कौन हूं। वैसे हैं कहां वो ?”

“किचन में हैं। मैं बुलाता हूँ।” इतना कह कर आशीष उत्सुकता के साथ किचन की तरफ दौड़ा। वो अनजान शख्स दरवाजे पर ही खड़ा था। नन्हीं गीतिका अपने दरवाजे की ओट से उसे घूर रही थी।

“माँ, बाहर कोई अंकल आए हैं।”

“ये कौन अंकल आगये इस वक्त।” हल्की आवाज में ये कहते हुए सरिता बाहर निकली।

दरवाज़े पर देखा तो एक छब्बीस सत्ताईस साल का लड़का हाथ में बड़ा सा गिफ्ट पैक जैसा लिये खड़ा था। दो मिनट उसके चेहरे को गौर से देखने पर सरिता उसे पहचान गयी।

“अरे समीर, तुम ! व्हाट ए प्लैजेंट सरप्राईज।” सरिता ने हैरानी से उसकी तरफ देखते हुए कहा।

“कैसी हैं दी ?” समीर ने मुस्कुरा कर सरिता का हाल पूछा।

“मैं तो ठीक हूँ। पर तुम अचानक यहां कैसे ? तुम्हें तो घर का पता भी ठीक से नहीं मालूम था, फिर कैसे पहुंच गये। न कोई मैसेज न फोन ?” सरिता की आंखों में हैरानी और खुशी दोनों के मिले जुले भाव झलक रहे थे।

“दी एक सलाह दूं ?” अचानक से ऐसा बोलने पर सरिता और हैरान हो गयी।

“हां बोलो ना।” सरिता अपनी हैरानी को दबाते हुए बोली।

“अगर आप मेहमानों को ऐसे ही दरवाजे पर खड़ा रख कर बात करती हैं तो अच्छा होगा यहां एक कुर्सी लगवा दें। मेरे जैसे कुछ आलसी खड़े खड़े थक भी जाते हैं।” समीर के इस व्यंग्य से सरिता को खयाल आया कि अभी तक समीर बाहर ही खड़ा है। अपनी गलती का ध्यान आते सरिता जोर से हंसने लगी।

“हाहाहाहा नहीं नहीं, वो तुमें अचानक देख कर इतनी हैरान हो गयी कि ध्यान ही नहीं रहा। आओ न तुम्हारा अपना घर है।” इतना कह कर सरिता समीर को अंदर बुला लाई। बच्चे अभी तक इसी दुविधा में फंसे थे कि आखिर ये कौन से मामा हैं जिन्हें हमने पहले कभी नहीं देखा।

“माँ ये कौन हैं ?” छोटी सी गीतिका ने अपनी मां के कान में फुसफुसाते।हुए सवाल किया।

“अरे तुम लोगों ने पहचाना नहीं इन्हें ? यही तो हैं सैम मामू, जिनसे फोन पर बात होती है। नमस्ते करो।” बच्चों ने समीर को पहचान लिया क्योंकि उससे बच्चों की हमेशा बात कराया करती थी सरिता। बच्चों ने समीर को नमस्ते की तो समीर ने अपने बैग से बड़ी बड़ी दो चौकलेट्स निकार कर दोनों के हाथ में थमा दी।

“दी अचानक से आगया, इससे कोई परेशानी तो नहीं हुई ना।” समीर ने अपने मुस्कान को थोड़ा कम करते हुए पूछा।

“अरे पगलू हो क्या ? तुम और मैं पिछले तीन साल से भाई बहन का रिश्ता निभा रहे हैं। ऐसा लगता है जैसे बचपन से जानती हूं तुम्हें। हर खास दिन पर तुम्हारा घंटो फोन आता है। मैं तो कब से कह रही थी घर आने को मगर तुम ही आलसी हो। हां बस थोड़ा अच्छा इसलिए नहीं लग रहा क्योंकि पहले बता दिये होते आने के बारे में तो सारा इंतज़ाम कर के रखती।”

“पहले बता दिया होता तो आपके चेहरे पर सजी ये खुशी कैसे देख पाता।” इस पर सरिता कुछ बोली नहीं बस मुस्कुरा दी

“अच्छा मैं पहले ही बहुत लेट हूं तो आप जल्दी से मुझे राखी बांध दीजिए।” समीर की बात सुन कर सरिता ने कुछ देर उसे गौर से देखा और इसके साथ ही उसकी आंखों में न जाने क्यों आंसू मुस्कुरा उठे।

जल्दी जल्दी सरिता पूजा के कमरे की ओर बढ़ी, वहां से थाली उठाते हुए उसने एक बार बाल कृष्ण की मूर्ति की तरफ मुस्कुरा कर देखा। शायद वो मन ही मन कह रही थी कि देर से ही सही मगर सुनते जरूर हो।

कुछ ही देर में वो राखी की थाली लिए समीर के सामने थी। समीर को राखी बांधने के दौरान वो उसके चेहरे में कुछ तलाशती रही थी। ऐसा लग रहा था मानों वो किसी अपने का चेहरा तलाश रही थी जो उसे समीर के चेहरे में साफ दिख रहा था। समीर ने वो गिफ्ट पैक जो अपने साथ लाया था सरिता को दिया। पहले तो सरिता ने साफ मना किया पर फिर समीर के कई बार आग्रह पर उसे लेना पड़ा।

इसके बाद समीर बच्चों के साथ बातें करने लगा इतने में सरिता ने खाना लगा दिया। समीर ने भी बड़े चाव से खाना शुरू किया।

“अच्छा समीर ये सब कैसे प्लान किया तुमने। अभी परसो हमारी बात हुई पर तुमने आने का कोई जिक्र नहीं किया।”

“दी तीन साल से हम फेसबुक पर साथ हैं। इस दौरान आपकी सभी पोस्ट जिन्हें आप दिल की बातों के हैश टैग में लिखती हैं वो सब दिल से महसूस की हैं मैने

मेरी हर चिंता फिक्र को आपने बड़ी बहन बन कर बांटा है हमेशा। हर समय मेरी सहायता के लिए तैयार रही हैं आप। ये ऐसा दौर है जहां लोग अपने करीबियों पर यकीन करने से कतराते हैं वहीं आपने हमेशा मुझे छोटा भाई मान कर प्यार लुटाया।

जानती हैं दी ये समाज बहुत बुरा है, यहां हवा में बातें उड़ जाया करती हैं और मैं बहुत कुछ सोच कर चलने वाला इंसान हूं। यही कारण रहा कि मैं कभी आपसे मिलने नहीं आया। मगर कल जब मैं अपनी छोटी बहन के पास बैठा था तो ऐसे ही बातों बातों में मैने आपकी पिछले साल की पोस्ट का जिक्र किया।

जिसमें आपने लिखा था कि “कोई भी खास दिन या त्यौहार किसी खास से जुड़ा होता है और उसके रूठ जाते ही उस खास दिन के मायने भी बदल जाते हैं। फिर वो खास दिन जो कभी बेशुमार खुशियाँ दिया करते थे बाद में शूलों की तरह चुभते हैं।” सरिता को वो पोस्ट अच्छे से याद थी। इस समय उसके चेहरे पर मुस्कान थी और आंखों में आंसू बन कर यादों की लहरें उठ रही थीं। कुछ बोल पाने की स्थिति में नहीं थी वो।

“भले ही मैने कभी आपसे नहीं पूछा मगर आपका दर्द हमेशा महसूस किया है। मैं फेसबुक से जुड़ा था इसीलिए पर्सनल होना मुझे कभी सही नहीं लगा। यही सब बातें मैने जब बहन से बताईं तो उसने मुझसे कहा कि भईया, सरिता दी हम सब से भले न मिली हों मगर जब फोन आता है तो लगता ही नहीं कि वो हम सब से अलग हैं।

आप कल उनके यहां जाइए और राखी बंधवाइए, उन्हें बहुत ज्यादा खुशी होगी और उनकी यही खुशी मेरे लिए आपका गिफ्ट होगा।” मैं मुस्कुरा दिया उसकी बात सुन कर क्योंकि मैने पहले से ये सोच रखा था। पता मैने जीजू से ले लिया था और उन्हें कहा कि आपको ना बताएं। वो कुछ देर में आते ही होंगे।”

सरिता अपने आंसुओं को अब और रोक नहीं पाई। आज सुबह से वो जितना दुखी थी उससे कहीं ज्यादा वो इस वक्त खुश थी।

“समीर, तुम नहीं जानते आज तुमने मुझे कितना कीमती तोहफा दिया है। तुमने मेरे अंदर की वो कमी पूरी कर दी जिसने मुझे हमेशा अधूरा रखा। मेरा भाई रमन जो मुझे दुनिया की हर चीज से बढ़ कर प्यार करता था वो मुझसे मुंह मोड़ गया।

मैं पूरा साल अपने आप को बांधे रखती थी मगर इस दिन आकर टूट जाती थी। हर साल राखी की थाली इसी आस में तैयार रखती थी कि वो इस बार पक्का आएगा मगर हर बार भूल जाती थी कि वो अब कभी नहीं आ सकता। ये राखी का दिन मुझे कचोटता है समीर, पागल कर देता है।” सरिता रो पड़ी

“वो दूर था मुझसे, मैने ही उसे जिद्द में आकर कहा था कि हर हाल में राखी पर आना है। मेरी जिद्द पूरी करने के लिए ही वो आ रहा था मगर रास्ते में ही वो ऐसे खोया कि फिर दोबारा घर नहीं लौटा। मैं सोचती हूं तो खुद से चिढ़ लगती है मुझे, मैं जिद्द न करती तो वो जिंदा होता आज।

मेरा प्यार ही उसके लिए काल बन गया। मगर मैने कभी नहीं माना कि वो चला गया है, मुझे हमेशा लगता था वो आयेगा। सब मुझे पागल समझते थे मगर देख समीर आज रमन आ गया।

आज इतनी तपस्या के बाद मुझे मेरा रमन मेरे समीर के रूप में मिल गया। आज मेरी राखी की थाली यूं ही पड़ी नहीं रही।” समीर के राखी वाले हाथ पर सर रख के सरिता फूट फूट कर रो पड़ी और बच्चे उससे लिपट गये।

“सॉरी दी, मैने आने में बहुत वक्त लगा दिया। मुझे बहुत पहले आ जाना चाहिए था। मगर अब वादा करता हूं, मैं कभी आपको छोड़ कर नहीं जाऊंगा।” समीर भी खुद को भावनाओं की इस लहर में बहने से ना रोक पाया और बिलख कर रो पड़ा ।

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