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पांच राज्यों के चुनावी परिणाम के बाद पढ़िए क्या है भाजपा के इस हार के मायने ।

अभिजीत तन्मय/पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम आ गए और आशा के विपरीत भाजपा को नाकामी हाथ लगी। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में लगातार पंद्रह साल से सरकार थी लेकिन इस बार छत्तीसगढ़ में जनता ने मानो मूड बना रखा था कि भाजपा को उठने नही देंगे।

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महज 15 सीटों पर रोक देना और 16.7% मत पूरे प्रदेश से मिलना एक संकेत है कि आप बहुत अधिक समय तक जनता को भटका नही सकते है। आज भाजपा का छत्तीसगढ़ मॉडल खुद अपने ही राज्य में ध्वस्त हो गया।

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मध्यप्रदेश में भाजपा जीतते-जीतते हार गई।महज कुछ फासले से मंजिल छूट गयी ये मलाल अगले पाँच साल तक जरूर सालते रहेगी हालांकि एक बात संतोषप्रद जरूर रही कि इस हार में भी वोट प्रतिशत बढ़ी है।
नोटा ने एक बड़ा फैसला पैदा कर दिया वर्ना जीत अभी कदम चूम रही होती।
राजस्थान में कुछ साल पहले से ही परिणाम की झलक दिखने लगी थी। मुख्यमंत्री के कुछ निर्णय का विरोध जनता खुलकर कर रही थी। मंत्रियों के खिलाफ धरना प्रदर्शन लगातार हो रहा था इसके बावजूद भाजपा इस मुग़लते मे रहे कि इस बार भी मोदी ही नैया पार करवा देंगे लेकिन यही तो लोकतंत्र की खूबसूरती है कि जनता यहां वोट देने के दिन जनार्धन रहती है। जनता ने अपना फैसला सुना दिया। विश्वास तो भाजपा का चुनाव के समय से ही डगमगा रहा था उस पर चुनाव परिणाम ने मुहर लगा दी।
आखिर क्या रहे वो कारण जिस कारण जनता ने भाजपा को नकारा ।
1.अतिआत्मविश्वास:

2014 के लोकसभा चुनाव जीतने के बाद लगभग सभी प्रदेशों में बेहतर प्रदर्शन करने के कारण भाजपा का आत्मविश्वास काफी बढ़ा हुआ था। भाजपा की तीन राज्यों में सरकार थी जिस कारण पार्टी को लगा कि नैया आसानी से पार लग जाएगी लेकिन ऐसा हुआ नही। इस परिणाम ने आने वाले चुनावों में एक बार सोचने को मजबूर जरूर कर दिया है।
2.निष्ठावान कार्यकर्ताओं की अनदेखी:

अक्सर देखा ये जाता है सरकार बनते है या एमपी/एमएलए/मंत्री बनते ही जमीनी स्तर के कार्यकर्ताओं की अनदेखी होने लगती है। उसके जगह पर चाटूकार और दलाल किस्म के लोग शामिल हो जाते है जो हकीकत से नेताओं को दूर रखते है और झूठ की धरती पर बालू का महल बना कर गुमराह करते है। कमीशनखोरी और दलाली बढ़ जाती है जिससे भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ताओं का मोहभंग होना शुरू हो गया। विधायक,सांसद और मंत्री वही देखते और सुनते है जो उनके खास लोग सुनाना और दिखाना चाहते है।
3.एसटी/एससी कानून से छेड़छाड़:

इस कानून से छेड़छाड़ भाजपा के लिए आत्मघाती साबित हुआ। इस कानून में बदलाव के आसार से फारवर्ड और ओबीसी जहां खुश थे वही दलित और आदिवासी विरोध में खड़े हो गए आखिरकार सरकार बिल को वापस ले ली जिससे सवर्णों और ओबीसी का गुस्सा भी सहना पड़ा जिस कारण भाजपा को माया मिली न राम वाली कहावत चिरतार्थ हो गयी। नोटा में पड़ा वोट इस बात का प्रमाण है।20181212_114454
4. राम मन्दिर पर बैकफुट:

2014 में वोट देते समय ज्यादातर लोगों ने यही सोचा था कि इस बार राम मंदिर का निर्माण कार्य शुरू हो जाएगा लेकिन भाजपा की टालमटोल नीति ने मतदाताओं के साथ-साथ हिंदूवादी संगठनों के साथ साथ कार्यकर्ताओं के इंतजार पर भी पानी फेरने का काम किया।
राम मंदिर पर निर्णय में देरी भी एक महत्वपूर्ण कारण बनी।
5.किसानों की अवहेलना भी पड़ी मँहगी:

सरकार बनते ही भाजपा के खिलाफ किसान आंदोलन लगातार होते रहे। भाजपा मँहगाई को कम करने में विफल रही। किसानों के द्वारा आत्महत्या भी बहुत हुई जिसने विरोध के बिगुल को और मजबूती प्रदान कर दी। विपक्ष लगातार इस आग को जलाए रखने में भी सफल रहा।
6.अहंकार:

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सोशल मीडिया पर एक समय भाजपा काफी मजबूत थी। मोदी जी सोशल मीडिया के कारण ही बहुत ज्यादा चहेते बन गए थे लेकिन आज भी हम(भाजपा) सबसे आगे है इसी अहंकार ने भाजपा को पीछे कर दिया। इस चुनाव में काँग्रेस सोशल मीडिया में काफी आगे हुई है।
7.टिकट काटना भी पड़ा मँहगा:

भाजपा ने इस चुनाव में कई एमएलए और मंत्री का टिकट काट दिया था जो हार का एक बड़ा कारण बना। भितरघात भी भाजपा को लगातार कमजोर करते जा रही है।
अगर जल्द ही भाजपा अपनी इन कमजोरियों को ठीक नही करती है तो आने वाले लोकसभा और विधानसभा चुनावों में इसका खामियाजा भुगतना पड़ सकता हैं। काँग्रेस अपने प्रदर्शन से काफी खुश दिख रही है लेकिन कुछ लोग इसे काँग्रेस की जीत नही बल्कि भाजपा की हार मान रहे है खैर ये नजरिया हो सकता है लेकिन सरकार बनाने के लिए आँकड़े की जरूरत होती है नजरिये की नही।

About मैं हूँ गोड्डा (कार्यालय)

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