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आजादी के 73 वीं वर्षगाँठ पर आइए जानते हैं जीरो विकास वाला गांव,जिसे आज भी आश्वासन की मिल रही है जन्मघुटी ।

सत्ता बदलती रही पर सुविधाओं से महरुम रहा मासपाड़ा ।

राघव मिश्रा,अजित कुमार सिंह/मालुम हो कि अपने अपने क्षेत्र के विकास का डंका पीटने वाले कई जनप्रतिनिधियों ने आदिवासियों एवं पहाड़ियाओं की हित की बात वर्षो से करते रहे हैं पर बदहाल पहाड़िया को खुशहाल जीवन जीने का सपना दिखा उसे हकीकत का अमली जामा पहनाने से कोसो दूर होते दिखे । इन जनजातियों के लिए विकास एक कोरी कल्पना भर है।वैसे तो हर नेता यहां आदिवासी की रक्षा एवं उनके हक की बातें करते हैं ।
पर बेचारी पहाड़िया महिलाओं,पुरुषों एवं वृद्ध लोगों व स्कूली छात्राओं को जाड़ा गर्मी व बरसात में खुले आसमान के नीचे शौच के लिए आज भी जाना पड़ता है जिसे बेहद ही चिंताजनक परिस्थितियों में हर दिन आसानी से देखा जा सकता है।
जिसे आज तक कोई भी विधायक व सांसद से लेकर स्थानीय प्रशासन को वैकल्पिक व्यवस्था भी बनाने की याद तक नहीं आयी।जहां आज भी सड़कें नही जाती,जहां आज भी पहाड़ की तराई से निकले दूषित पानी को ग्रहण करना पड़ता है,जहां मरीजों को खटिया पर लिटाकर कई किलोमीटर तक कांधे के सहारे ढोया जाता है।

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व्यवस्था के तहत एक ओर केंद्र सरकार जहां घर घर शौचालय निर्माण कार्य करने की अनिवार्यता लागू होने पर अग्रसर है ।जहां घर शौचालय निर्माण कर जिले को ओडीएफ किया जा रहा है,जहां हर परिवार को पक्के का मकान देने के वादे किए जाते हैं ,जहां ग्रामीण जलापूर्ति योजनाओं का दम्भ भरा जाता है
वहीं सुंदरपहाड़ी प्रखंड का बड़ा पख्तरी पंचायत का मासपाड़ा गांव जो वर्तमान विधायक एवं पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का क्षेत्र है,साथ ही यहां के सांसद झामुमो के विजय हांसदा हैं ,उक्त गांव में आजतक कोई विकास कार्य न होना, कई दशक बीतने पर भी जनहित एवं मूलभूत सुविधाओं का एक भी कार्य न कराया गया है ऐसे माननीयों के द्वारा आदिवासी पहाड़िया के प्रति कितना सम्मान है ।केवल सोचने से ही पता चल सकता है ।

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बात यहीं पर समाप्त नहीं होती, ऐसा नहीं कि जनप्रतिनिधियों को मौका नहीं मिला लेकिन गांव के विकास एवं आदिवासी सम्मान के दिखावे का दम्भ भरने वाले इन माननीय द्वारा मूलभूत सुविधाओं से ग्राम वासिओं एवं वहाँ की महिलाओं को हर रोज दो चार होना पड़े तो फिर उम्मीद किस पर की जाय।

लेकिन मासपाड़ा के ग्रामीण बताते हैं कि सुविधा की तो बात दूर आजतक हमने किसी जनप्रतिनिधि तक का चेहरा नही देख पाया है,दुर्भाग्य है इस गांव का जहां आजादी के बाद से आजतक कोई जनप्रतिनिधियों के कदम इस गांव में नही पड़ी है ,हालांकि चुनाव के वक्त कुछ नेताओं के नुमाइंदे पहुंचकर बड़े बड़े वादे कर चले जाते हैं जो वापस फिर चुनाव में ही आते हैं ।कुछ लोगों का कहना है की हमे अपनो ने ही लुटा है जिसने हमे उन हरे कपड़ो में पंछी पहनाकर हमे संथाल आदिवासी होने का एहसास कराया है उन लोगों ने कभी हमारी सुध नही ली ,हां चंद पैसे के लोभ देकर चुनाव के वक्त दूर दराज इलाकों में लगे जनसभा में हमे बुलाकर भीड़ जरूर जुटाया जाता रहा है ।हम आजाद भारत का 73 वीं वर्षगांठ मना रहे हैं लेकिन मूलभूत सुविधाओं से वंचित इस गांव की तरफ किसी ने आजतक अपनी उस नजर से कभी नही निहारा जिससे विकास का दम्भ भरा जाता रहा है ,और तो और पहाड़ों एवं जंगलों के बीच भीषण गर्मी में नन्हे मुंन्हे बच्चों के साथ महिलाएं पहाड़ की तराई में पानी भरने को विवश है ।

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लेकिन जिम्मेदार लोगों को आज तक इन बेबस लोगों का कष्ट नहीं देखा गया।शायद यही कारण है कि जिले के सुंदरपहाड़ी प्रखंड के माल पख्तरी पंचायत आज भी विकास से मरहूम है ।
आइये हम लेकर चलते हैं बड़ा पख्तरी पंचायत का वो गांव जहां बीमारियों को कांधे पर ढोया जा रहा है ।।
संताल परगना के गोड्डा ज़िले के सुंदरपहाड़ी प्रखंड में कई जनजातियां निवास करते हैं। यहां के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों में निवास करने वाली जनजातियों में ‘पहाड़िया’ जनजाति को सबसे प्राचीन जनजाति माना जाता है।

लगातार आ रही है पहाड़िया परिवार की जनंसख्या में कमी

विकिपीडिया से मिली जानकारी के अनुसार मौजूदा वक्त में ‘पहाड़िया’ जनजाति की संख्या में लगातार कमी आ रही है जो भारी चिंता का विषय है। वर्ष 2001 में भारत की जनगणना के अनुसार इनकी जनसंख्या 61,121 थी। वहीं, साल 2011 की जनगणना मे यह घट कर मात्र 46,222 रह गई। और तो और एक आंकड़े के मुताबिक सुंदरपहाड़ी में मौजूदा वक्त तकरीबन 30 हजार पहाड़िया बचे हैं सरकारी आंकड़े के मुताबिक यहां मात्र 4247 परिवार हैं। अब प्रश्न उठता है कि इन दस वर्षों में इतनी भारी संख्या में पहाड़िया’ आखिर कहां चले गए ?
बाहरी हस्तक्षेपों एवं तथाकथित विकास के बुलडोज़रों ने इन आदिवासियों के प्राकृतिक संसाधनो को कम कर दिया है। वे आदिवासी जंगलो पर आश्रित थे जिनका जीवन कंदमूल, जड़ी बूटी एवं जंगली उत्पादों द्वारा चलता था। विकास के नाम पर जब अंधाधुंध जंगलों की कटाई शुरू हुई तब यहां की स्थानीय जनजातियां भी उस तथाकथित विकास के कारण प्रभावित हुई।
आज आजदी के 73 वीं वर्षगाँठ के बाद भी अगर हम इन्हें ऐसे ही वंचित रखेंगे तो वो दिन दूर नही जब इन पहाड़ों जंगलों से इनका पलायन हो जाएगा ।
केंद्र से लेकर राज्य की सरकार तक ये प्रयास कर रही है कि सभी गांवो पंचायतों को मुख्य मार्ग से जोड़ा जाय ताकि ग्रामीण क्षेत्रों के सुदूरवर्ती इलाकों तक के लोगों को आवागमन की सहूलियत मिल सके मगर नक्सल प्रभावित सुन्दरपहाड़ी का एक पंचायत आजादी के सत्तर सालों बाद भी एक सड़क से मरहूम है ।।
चारों तरफ जंगलों के मनोरम नजारों से घिरा ये नक्सल प्रभावित प्रखंड सुन्दर पहाड़ी थाना क्षेत्र के बड़ा पख्तरी पंचायत की तरफ जाने वाली मार्ग
है ,जहां बाईक और पैदल छोड़कर किसी अन्य सवारी से जाना दुर्लभ है .प्रखंड मुख्यालय से तीस किलोमीटर की दुरी पर इस पंचायत तक सूखे में बाईक से
पहुंचेंगे ,लेकिन अगर उस दिन बारिश हुई तो जाना मुश्किल है।

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जहां खटिया पर टांगकर बीमारियों को लाया जाता है

इस पंचायत का एक गाँव है मासपाड़ा जहां तो स्थिति और भी दयनीय है ,हम जब उस गाँव में किसी तरह पहुंचे तो गाँव के एक बीमार शख्स को अस्पताल तक ले जाने की तैयारी हो रही थी जिसको लेकर खटिया का जुगाड़ हुआ ताकि पांच किलोमीटर दूर तक जब एम्बुलेंस आएगी तो वहाँ तक ले जाया जा सके,पूछने पर ग्रामीण बताते हैं कि रोगियों को इलाज के लिए ले जाने का और दूसरा कोई विकल्प है ही नहीं गाँव तक वाहन सडक के अभाव में पहुँच ही नहीं पाती ।

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खैर कुछ ग्रामीण बीमार शक्स को लेकर परिजनों के साथ मुख्य मार्ग की तरफ निकल पड़े ,वहाँ बचे बाकी ग्रामीणों से इस बाबत जब जानकारी मांगी तो उन्होंने कहा कि रोगियों को इस तरह इलाज में देरी होने की वजह से चार से पांच लोगों की जाने इस गाँव में जा चुकी है ,बताते चलें कि सुन्दरपहाड़ी प्रखंड बरहेट विधानसभा क्षेत्र और राजमहल लोकसभा क्षेत्र के अंदर आता है जहां हमेशा से झामुमो का गढ़ रहा है,विगत पांच वर्षों से इस इलाके के सांसद विजय हांसदा और विधायक पूर्व मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन हैं ,इससे पहले इस विधानसभा में झामुमो से ही तीन लगातार टर्म तक हेमलाल मुर्मू विधायक रहे थे ,मगर बावजूद इसके इस क्षेत्र में बुनियादी सुविधाएं मयस्सर नही हो सकी,ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि सांसद विधायक एक तो आज तक आये नहीं और उन्हें शायद हमारे गाँव का नाम तक नही पता होगा,सिर्फ चुनाव के वक्त उनके कार्यकर्ता आकर वादे कर चले जाते हैं ।
बहरहाल आजादी के 72 वर्षों बाद भी इस गाँव तक सड़क नही
बनना कई सवाल तो जरुर खड़े करता है।
1.विकास को लेकर क्या सिर्फ जनप्रतिनिधि गण भोले भाले आदिवासी को गुमराह करते नहीं आये ??
2. विकास के लिए सरकार द्वारा जब पूरा सिस्टम काम करता है बावजूद इसके इतने वर्षों में इस गाँव पर प्रखंड से लेकर जिला प्रशासन की नजरे इनायत क्यों
नही हो सकी ..??
3.सड़क के कारण इलाज के अभाव में हुई मौतों का जिम्मेवार
कौन ??
और सबसे यक्ष प्रश्न ये कि क्या अब भी इस पंचायत को सड़क मिल भी पायेगा या नहीं ?

दूषित जल पीने को आज भी हैं मजबूर 

वहीं विकास में अगर ग्रामीण जलापूर्ति पर भी बात करें तो
केंद्र से लेकर सूबे की सरकार हर व्यक्ति को शुद्ध पेयजल और भोजन मुहैया कराने को लेकर तत्पर नजर आती है और उस दिशा में रात दिन एक किये हुए है,मगर गोड्डा जिले के सुन्दर पहाड़ी का यह गाँव आज भी जिला प्रशासन और जन प्रतिनिधियों की उपेक्षा की वजह से आज शुद्ध पेयजल को भी तरसते नजर आ रहे हैं ।

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संताल आदिवासी की आबादी वाले इस प्रखंड के मासपाड़ा गाँव में सुबह होते ही घर की महिलाएं और पुरुष गाँव से एक किलोमीटर दूर पहाड़ की तराई से रिसते हुए जलश्रोत का पानी लाने निकल पड़ते हैं,वहीँ से पानी लाकर पिने को विवश हैं, क्योंकि यहाँ आजादी के बाद से आज तक न तो कुआं ही बना न ही चापाकल ही विडंबना देखिये सुन्दर पहाड़ी प्रखंड जो सुरक्षित क्षेत्र है ये क्षेत्र गोड्डा जिले में अंतर्गत भले ही आता है मगर संसदीय क्षेत्र विजय हांसदा और नेता प्रतिपक्ष हेमंत सोरेन के विधानसभा क्षेत्र में आता है ,ये नेता संताल आदिवासियों के हितों की रक्षा का दम्भ भले ही भरते नजर आते हैं मगर इन जनप्रतिनिधियों की नजर इनलोगों पर सिर्फ चुनाव के वक्त ही दौड़ाते हैं ।ग्रामीण महिला शेफाली किस्कु बताती है कि पहाड़ की तराई में ही नहाते हैं कपड़ा भी यहीं साफ करते हैं और इसी दूषित पानी को घर ले जाकर पीने को भी मजबूर हो जाते हैं ।

स्नेहम ने बदली पहाड़िया परिवार की जिंदगी ।

कौन कहता है कि आसमां में सुराख नही हो सकता ,एक पत्थर तो तबियत से उछालो”
इस कहावत को चरितार्थ करने का काम जिले के सबसे अशिक्षित और विकास से मरहूम आदिवासी बाहुल प्रखंड सुन्दर पहाड़ी के इसी मासपाड़ा गाँव आज तक विकास नाम की चीज नही पहुंची लेकिन गाँव तक जब पहुँचने को सडक नहीं तो पेयजल ,बिजली और शिक्षा की बात बेमानी होगी,इस गाँव में लगभग तीस घर है जिनकी आमदनी का जरिया जंगलों के पत्ते चुनकर पत्तल बनाना ,और घर में शराब बनाकर आस पास के ग्रामीण हाट बाजार में बेचकर रोजी रोटी चलना था,ये लोग साल भर में अपने खेतोंमें सिर्फ एक फसल धान ही लगाते और वही चावल खाते और जो बचा उसे बेचकर घर गृहस्ती चलाते थे,मगर इस गाँव में भटकता हुआ एक युवक स्नेहम पहुंचा जो जिले से बाहर किसी एनजीओ में कार्य किया करता था उसने इस गाँव की हालत देखकर ग्रामीणों के बीच धान की फसल के बाद बेकार पड़े खेत में तरबूज उपजा कर आमदनी बढाने का सुझाव दिया जो ग्रामीणों को पसंद आया ।

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फिर क्या था गाँव के जितने भी खेत धान की फसल के बाद बेकार रहते थे लगभग एक एकड़ में सभी ग्रामीणों ने मिलकर पिछले जून महीने खेतों में तरबूज की खेती कर डाली उस युवक द्वारा दिए गए बीज से तरबूज लगा दिए गए ,मगर पानी जो पटवन के लिए चाहिए था वो भी सभी महिला और पुरुषों द्वारा गाँव से दूर एक प्राकृतिक जल श्रोत से लाकर सिंचाई करते गए और ग्रामीणों की मेहनत रंग लायी ,उपज तो ऐसी हुई कि गाँव वाले ख़ुशी से फुले नहीं समाने लगे ,एक एक तरबूज चार से पांच किलो के हुए,अब समस्या तरबूज को बाजार तक पहुंचाने की थी गाँव से लगभग तीन किलोमीटर तक बोरियों में भरकर किसी ने माथे से तो किसी ने साइकिल और किसी ने मोटर साइकिल से मुख्य मार्ग तक पहुंचाया और फिर वहाँ से गाड़ी से 30 किलोमीटर दूर प्रखंड मुख्यालय सुन्दर पहाड़ी तक पहुंचाया जहां से जिला मुख्यालय मंडी तक पहुंचाई गयी ,पहली बार किये गए इस खेती में लगभग बीस क्विंटल तरबूज ग्रामीणों ने उपजाया और मुनाफा भी कमाया ,इस कमाई से ग्रामीणों में बहुत उत्साह बढ़ा और अगले वर्ष और भी अधिक खेतों में तरबूज लगाने का मन बना डाला,मगर ग्रामीणों को दुःख इस बात का है कि इस गाँव में पानी की सुविधा और सड़क हो जाती तो वे और भी ज्यादा आमदनी बढ़ा सकते थे ।

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इधर इस खेती में ग्रामीणों को हुए आमदनी से इन पहाड़ियों को चेहरे पर खुशी लाने वाला स्नेहम भी काफी उत्साहित नजर आया उन्होंने कहा कि पहली बार किये गए इस प्रयोग से ग्रामीणों के चेहरे पर जो संतोष देखने को मिल रही है वो देखने लायक है।स्नेहम के इस प्रयास को सरहाने की भी जरूरत है जिससे उसके हौसले और भी बढ़े और ऐसे निरंतर प्रयास से पहाड़िया जनजातियों का पलायन भी रुकने में कारगर साबित हो ।

आश्वाशन की मिली जन्मघुटी ।

इस मुद्दे पर जब हमने जिले के उप विकास आयुक्त सुनील कुमार से बात की तो उन्होंने पहले तो आश्चर्य लगा और फिर आश्वास की घुटी पिला डाली और कहा की
14 वें वित्तीय आयोग से गांव में सड़क पानी की व्यवस्था जल्द की जाएगी ,उन्होंने वहां ले लोगों के द्वारा कठिन परिस्थितियों के तरबूज की खेती को भी सराहा और आश्वासन दिया की वहां जल्द ही सड़क निर्माण किया जाएगा और जो भी बुनियादी सुविधाएं की कमी रहेगी उसे पूरा किया जाएगा
अब देखना ये होगा कि अगले वर्ष जब तरबूज लगाने का समय होगा तब तक गाँव वाले को पीने का पानी और सड़क नसीब हो पाती है या नही ?या फिर यूँ ही इस मासूम से गांव को आश्वासन की जन्मघुटी हर वर्ष मिलती रहेगी .?

About मैं हूँ गोड्डा (कार्यालय)

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