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शिक्षा के मंदिर में अशिष्टता की पाठ

भारत गुरुओं का देश रहा है और गुरु की गरिमा को बढ़ाने के लिए उद्धरणों की कोई कमी नहीं है ।वहीं गुरु की गरिमा को तार-तार करने के लिए भी उदाहरणों की कमी नहीं है। शिक्षण संस्थान प्रकरण इसका एक उदाहरण है। जहां विनम्रता और सहनशीलता की उर्वरा भूमि पर उदंडता के कैक्टस का परिचय दिया गया है।

“माफ करना” गुरु का पहला धर्म होता है लेकिन जिस प्रकार का व्यवहार परिसर में किया गया वह भी उसे भी किसी भी तरह से शोभनीय नहीं कहा जा सकता है। वहम में आकर अहम का टकराव से समाज में क्या संदेश दे रहे हैं। शिक्षक तो मॉडल होते हैं और बच्चे उसी मॉडल का अनुकरण करते हैं ।

अगर इसी तरह होते रहे तो शिक्षा के इस मंदिर से क्या उम्मीद की जा सकता ? क्षमा आपका धर्म है ,विनम्रता आपकी कर्म है ,सहनशीलता ही आपकी सफलता का मर्म है।

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