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ललमटिया त्रासदी के 2 वर्ष,आज भी चीख रही है काले हीरे की कोख से कई जिंदगियां।

पूरा देश नये साल के आगमन की तैयारी कर रहा था की अचानक गोड्डा जिले में एक ऐसी आफत आई थी की पुरे देश को झकझोर दिया था !
वो मौत की काली रात थी 29 दिसम्बर 2016 का ,समय शाम के 7.12 मिनट !

मैं हूँ गोड्डा टीम/राजमहल परियोजना की त्रासदी को घटे दो वर्ष हो चुके लेकिन एक सवाल सबके जेहन में आज भी टिस मार रहा है कि आखिर उन मौत के सौदागर का अबतक क्या हुआ ?
कौन था वो सौदागर जिसने चंद रुपयों को मुवावजे में देकर लाश का सौदा किया? ये एक बड़ा सवाल तो आपको लगेगा ही,क्योंकि राजमहल त्रासदी भारत की ओपन कोलमाईन्स की सबसे बड़ी त्रासदी थी ,और दो वर्ष बीत जाने के वावजूद कोई कार्यवाई नजर नही आई बावजूद इसके रेस्क्यू में भी ढील बरती गई थी और आज भी बरती जा रही है जिसे आप “ऊंट के मुह में जीरा का फोरन कह सकते”इस हादसे में सरकारी आंकड़े के अनुसार तकरीबन 23 लोग दबे थे जिनमे 18 की लाश की पुष्टि की गई कुछ लोगों के जिन्दा होने की भी बात भी वहां काम कर रही कम्पनी महालक्ष्मी द्वारा कहि जा रही थी,उस वक्त भी बिजली की भीषण समस्या को दिखाते हुए ‘ब्लैक आउट’ की डर दिखाकर रेस्क्यू भी स्थिर कर दी गई थी ,जहाँ लाशें दफन थी वहां चौड़ी सड़क बनाकर डम्फर चल रहा था ,वक्त बीतता गया जिसके बाद एनडीआरएफ की टीम भी आई लेकिन सिर्फ लाशें ढोने के लिए क्योंकि इन एनडीआरएफ वाले को सिर्फ बाढ़ से निपटने का अनुभव ही था ।

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इस परिस्थियों से निपटने के लिए भारत सरकार को क्या मुक्कमल रेस्क्यू की व्यवस्था करनी थी ये तो सरकार ही जाने ,लेकिन दफन जिंदगी आज भी चीख रही है उस काले हीरे की कोख में की आखिर उसकी मौत का सौदागर कौन ? इस भीषण त्रासदी की घटना से पहले भी मजदूरों द्वारा काम को रोकने की सलाह दी गई थी ,वावजूद डर देकर काम कराया गया था आखिर क्यों?
घटना के ठीक तीन दिन पहले सीएमडी ने निरक्षण किया था फिर उनके द्वारा क्लीन चिट कैसे ? पी.एम.ओ से लेकर डीजीएमएस तक आशुतोष चक्रवर्ती ने पत्र लिखकर खतरे से आगाह किया था इसपर डीजीएमएस के द्वारा पत्र के जवाब में यह था कि यह तथ्य विहीन है,खदान पूरी तरह सुरक्षित है ।
खदान को 2015 से ही पर्यावरण अनापत्ति प्रमाण पत्र नही।

जानकारों की माने तो राजमहल परियोजना के इस ईसीएल खदान को 2015 से पर्यावरण नियंत्रण से अनापत्ति प्रमाण पत्र प्राप्त नही था ,और जब घटना घट चुकी थी तो सभी अधिकारी से लेकर नेता ,मंत्री से लेकर चमचे ने एक ही बात कही थी की दोषियों पर शख्त कार्यवाई होगी,दोषी बख्से नही जाएंगे ।इसके अलावा कुछ भी कहने से मुकर रहे थे।

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सरकार संवेदना देकर मुवावजे में कुछ पैसे की घोषणा भले ही कर दे लेकिन सरकार को चाहिये था कि उन परिवारों को, जिनका बेटा,पति,भाई इसमें दफन हो गया है उसे उसकी अस्थि भी मिल जाए ,ऐसी घटना के पीछे जो भी लोग दोषी हैं उनके ऊपर शख्त कार्रवाई हो और सजा मिले।

राजमहल हाउस के अंदर एक अलग ही खेल चल रहा था।

राजमहल हाउस से बाहर आने जाने वाले लोग कहते थे कि बाहर से जो भी हो लेकिन पर्दे के पीछे भी एक अलग खेल खेला जा रहा है ..इसे आप रंगीन या हंसीन भी कह सकते हैं बाहर लोग मातम मना रहे थे और अंदर के गलियारे यानि ईसीएल के आला अधिकारियों में लजीज व्यंजन के साथ विदेशी कीमती शराब की मांग पर मांग बढ़ रही थी।

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मंत्री सवालों से भाग रहे थे ,मजदूर कराह रहा था और ईसीएल अधिकारी मस्ती में थे,और प्रशासन आदेश का इंतिजार कर रही थी ।यह खेल पर्दे के पीछे की है जहां इस खेल को “मैनेज” नाम दिया गया था ।
इतनी बड़ी त्रासदी पर कुछ लोग भी पहले हरकत में आये थे ,अपनी भूमिका बाँधी थी पर ईसीएल ऐसी कम्पनी इसे उस वक्त के पूरे एक सप्ताह के खेल में सबको लाइन पर लाकर खड़ा कर दी थी ,और सरकार मौन थी ?सवाल यह है कि क्या मजदूरों की कीमत ऐसे ही लगाती है सरकार ?या न्याय भी दिलाती है ?यह त्रासदी एक मौत का आउटसोर्सिंग की कहानी बना डाली ,लेकिन जवाब आज भी नदारत है उस सवालों का की इतने मौत का सौदागर कौन था ?
इन सवालों के जवाब ढूंढने में सरकार को कई वर्ष भी लग सकते हैं चूंकि दो वर्ष तो आज पूरे हो ही गए हैं ।यहां सरकार की कहानी कुछ ऐसे चलती है जाँच टीम की अलग अलग टुकड़ी मुआयना करती है ,फिर ज्यादा दवाब आने पर इसे सीबीआई जांच का आदेश देकर अपना पल्ला झाड़ लेती है,और फिर अंततः सिर्फ कागजों पर दब कर रह जाती है यह काला अध्याय,और फिर शुरू होता है संवेदना और श्रद्धाजंलि जैसे औपचारिकताएं जिसे मोमबत्ती जला कर शांत कर दिया जाता है ।
लेकिन इस भीषण त्रासदी में लील गए ‘गगन’ के पिता को न उनके पुत्र की अस्थि मिलेगी और न ही उन परिजनों के आत्मा को शांति जिन्होंने अपना सबकुछ लूटा दिया इस खदान में ।परिजनों को भी खदान तक पहुँचने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा था,कुछ परिजन भी इस रंगीन दुनियां के हंसीन शाम के लपेटे में आकर अपने भवनाओं का भूर्ण हत्या कर दिए थे ।
प्रबंधन समेत अज्ञात पर हुआ था मामला दर्ज
इतनी बड़ी ओपन कोल माइंस की भीषण त्रासदी में 23 लोग जान गंवा बैठे,कितनी गाड़ियां दफन हो गई ,कितनी लाशें आज भी दफन ही है ,लेकिन बावजूद इसके कार्रवाई के नाम पर ईसीएल प्रबंधन ,अधिकारी एवं कुछ अज्ञात लोगों पर मामला दर्ज हुआ था,जिसका नतीजा आज भी सिफर है ।

महगामा अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी राजा मित्रा बताते हैं कि जांच अपने अंतिम पड़ाव पर है,जांचोपरांत जो भी दोषी होंगे वो बख्से नही जाएंगे ।

सूत्रों की माने तो घटना के वक्त ईसीएल जी.एम(ओ.पी)रहे डी के नायक आज जी.एम(आई.सी) के पद पर ईसीएल की राजमहल परियोजना में पदस्थापित हैं,जबकि सूत्र बताते हैं कि उस वक्त के जितने भी पदाधिकारी रहे उनपर मामला दर्ज हुआ है ।

यह त्रासदी जितनी बड़ी थी, उससे भी बड़े खेल ईसीएल के अधिकारी अंदर बैठे खेल रहे थे ।और कुछ लोगों के मन में अब भी यह बात चल रही है कि
“चाहता हूँ देश की धरती तुझे कुछ और भी दूँ ”
लेकिन इस खेल में चाहे जितनी भी लीपा पोती की जाय एक बात तो तय है कि सच्चाई को वक्त लग सकता है लेकिन कभी दब नही सकता ।

ट्रेड यूनियन के नेताओं की भूमिका थी संदिग्ध।

राजमहल त्रासदी के पूरे घटनाक्रम में ट्रेड यूनियन के नेताओं की भूमिका भी संदिग्ध दिखी थी,वहां पर कुल तेरह निबंधन ट्रेड यूनियन हैं ,जिसके सभी नेता उस वक्त मजदूरों की कम,और ईसीएल प्रबंधन की ज्यादा चमचई करते नजर आ रहे थे ।

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इस तरह के ट्रेड यूनियन पर गरीब मजदूर किस प्रकार की भरोसा जता सकता है जिसके प्रमुख नेता ही प्रबंधन की जी हुजूरी में लगा रहता था ,अगर ईमानदारी से ट्रेड यूनियन अपने कामो को निभाए होते तो शायद लाशों के साथ उन मजूदरों के पैरों में जूते होते ,आई कार्ड होता ,उनकी निबंधन संख्या होती लेकिन वहां तो सबकुछ नदारत था.जब इस मामले को जिला कांग्रेस अध्यक्षा दीपिका पाण्डे सिंह ने उठाई थी तो कांग्रेस के ही आला नेता ददई दुबे ने आकर उनके ही ऊपर सवाल खड़े कर दिए थे,ऐसे में उस वक्त की कहानी यह दर्शाता था कि कहीं न कहीं उनकी भी ट्रेड यूनियन के साथ संलिप्तता रही होगी,और तो और पूर्व विधायक सह मजदूर नेता राजेश रंजन भी उस पूरे घटनाक्रम में नजर नही आए, जबकि उनकी राजनीति की छवि ही मजदूरों के बीच से पनपी थी ।अगर मजूदरों की चिंता इन नेताओं का होता तो उस मलबे में दबे हुए मजदूरों के लाशों के पैरों में जूते, गले में आई कार्ड,और कम्पनी के रजिस्टर में इनका नाम इनरोलमेंट जरूर होता ।

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अपनी राजनितिक छवि चमकाने में भले ही इन नेताओं ने मजदूरों को अपना हथियार बनाया हो भले ही उनकी लाशों पर राजनीति की हो लेकिन जब मजदूरों की हक की बात होती है तो सभी खामोश नजर आते हैं ।
ट्रेड यूनियन के नेताओं के ऊपर सवाल खड़ा करते हुए लोगों ने हमे बताया था कि यहां तेरह ट्रेड यूनियन रजिस्टर्ड हैं,और किसी भी ट्रेड यूनियन को लीगल में मेम्बरशिप नही है ,पूर्व में न्यू केंदा खदान हादसा में भी ट्रेड यूनियन ने आगे आकर पहले एफआईआर किया था,जबकि ईसीएल में उस वक्त तक ट्रेड यूनियन कहीं नजर नही आई थी ।

ऐसे में यह कहने में कोई संकोच नही होगी की ट्रेड यूनियन भी मामले को रफा दफा करने में ईसीएल प्रबंधन का साथ दे रही थी ।

प्रधानमंत्री ने भी ट्वीट कर जताई थी चिंता।

राजमहल परियोजना के ललमटिया खदान हादसे के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी गोड्डा खदान हादसे पर चिंता व्यक्त की थी।उन्होंने झारखण्ड के मुख्यमंत्री से बात कर पूरी जानकारी भी ली थी ।बावजूद आजतक कोई भी करवाई नही हुई ।
आंकड़ों के उलझा रहा शवों और मुआवजा का खेल।

गोड्डा जिला के इसीएल के ललमटिया स्थित राजमहल कोल् माइंस को 29 दिसम्बर को हुए हादसे ने जिला ही नहीं बल्कि पुरे झारखण्ड और देश को झकझोर दिया था .यह हादसा पिछले दस वर्षों में देश का सबसे बड़ा खदान हादसा था .इस हादसे में 18 शवों की बरामदगी हुई मगर बाकी कितने लोग इसमें दबे रहे इस पर आज भी संसय बरक़रार है ।
“ललमटिया “एशिया का सबसे बड़ा ओपन कास्ट कोल् माइंस राजमहल परियोजना जहां 29 दिसम्बर को एक भयानक हादसे में कई जिंदगियां मलबे के नीचे दफ़न हो गयीं थी,ये बात तो साफ़ हो गयी कि ये हादसा इसीएल प्रबंधन और आउट सोर्सिंग कंपनी महालक्ष्मी दोनों ही के लापरवाही की मिलीभगत के कारण हुई ,मगर सबसे बड़ी बात जो अब तक छनकर सामने आई कि आखिर कितने मजदूर सही मायने में दफ़न हुए इसका आंकड़ा न तो महालक्ष्मी बताने को तैयार थी और ना ही इसीएल प्रबंधन ,महालक्ष्मी कंपनी द्वारा जिला प्रशासन को कभी भी सही आंकड़ा बताया ही नहीं गया .हादसे की अहले सुबह यानी 30 दिसम्बर को चश्मदीद के बयान के अनुसार 40 लोग मलबे के नीचे दबे हुए थे ।मगर एस डी एम को कंपनी द्वारा सिर्फ 7 लोगों के दबे होने की सूचना दी गयी थी।
और फिर जब एक एक कर शवों के निकलने का सिलसिला शुरू हुआ तो 31 दिसम्बर को ये आंकड़ा 11 के पार पहुंचा तो कंपनी ने 20 लोगों के दबे होने की सूचना एस डी एम तक भिजवाई .
मगर जब तीन जनवरी को शवों का आंकडा 18 पहुंचा तो कंपनी ने बाकायदा लिखित रूप में 23 लोग और 17 गाड़ियों के मलबे में दबे होने की सूची एस डी एम तक पहुंचाई .इससे ये साफ़ जाहिर होता है कि इ सी एल प्रबंधन और महालक्ष्मी कंपनी द्वारा जिला प्रशासन को आंकड़ों के नाम पर बरगलाया जा रहा था,हालांकि उस वक्त एस डी एम ने बताया था कि जब तक कंपनी के द्वारा उपलब्ध कराये गए लिस्ट के अनुसार 23 लोगों का शव नहीं मिलता तब तक रेस्क्यू का काम जारी रहेगा ।
अलग अलग दिनों में कंपनी द्वारा दिए गए अलग अलग आंकड़ों से परेशान उस वक्त के महगामा एस डी एम संजय पाण्डेय ने कंपनी के दफ्तर से जाकर सभी मजदूरों का अटेंडेंस रोल जब अपने कब्जे में किया तब पता चला कि 90 मजदुर इसमें काम कर रहे थे जो 40-40 की शिफ्ट में काम पर लगाए जाते थे .अगर इस बात में सत्यता थी और पहले दिन के चश्मदीदों की बातों को माने तो 40 मजदुर दुर्घटना के वक्त खदान में मौजूद थे .मगर कंपनी द्वारा 23 का दावा किया जा रहा था,जबकि अबतक 18 शवों की बरामदगी हुई है,घटना के ठीक दो दिन बाद तक रेस्क्यू का काम बंद रहा।और सूत्रों की माने तो प्रबंधन और जिला प्रशासन पर रेस्क्यू बंद करने का दबाव भी बनाया जा रहा था ।

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इधर सरकारी प्रावधान के अनुसार जब तक शव या शव का कोई हिस्सा जब तक बरामद नहीं होता तब तक उस व्यक्ति के परिजन को मुआवजा नहीं दिया जा सकता,यही सवाल जब घटनास्थल का निरिक्षण करने पांच सदसीय टीम के साथ सूबे के श्रम मंत्री भी पहुंचे थे तो उन्होंने रेस्क्यू कर शव निकाले जाने की बात तो जरुर कह डाली मगर रेस्क्यू का काम ही बंद हो गया तो फिर उन परिजनों को मुआवजा कैसे मिली जो घटना के बाद से ही अपनों के शव के इन्तेजार में रात दिन एक पैर पर खड़े थे।

वहीँ महगामा के एक आर टी आई कार्यकर्त्ता सह महगामा विधायक प्रतिनिधि ने भी राजमहल परियोजना प्रबंधन और कंपनी पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा था कि ये कभी भी वास्तविक स्थिति की सही जानकारी ही नहीं देते। अगर मीडिया ने इस घटना को नहीं उछाला होता तो ये कभी मानते ही नहीं कि ये यहाँ के कार्यरत मजदूर थे चूँकि ये मजदूरों को कोई पहचान कभी देती ही नहीं जिससे ये साबित हो कि ये इनके मजदूर थे।
यकीनन खदानों में कोयला काटते मजदुर मैनेजमेंट को नहीं दीखते ,उन्हें केवल दिखता है हीरा बना कोयला ,टारगेट और कंपनी का मुनाफा। नहीं दिखता इन्हें मजदूरों की सुरक्षा ,नहीं दिखते मजदूरों पर आश्रित उनके परिजन। अगर दिखता तो फिर शायद ये मौत की खाद पर आंकड़ों का फसल नहीं लहलहाता। अब लाख टके का सवाल ये कि इस त्राशदी में आखिरकार कितने मजदूर काल के गाल में समाये शायद इसका जवाब किसी के पास नहीं।

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