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क्यों सिद्धू के ताजा बयान पर हंगामा करने वाले लोग भारत को महज़ 70 साल का बच्चा ही समझते हैं ।

राघव मिश्रा/भौगोलिक भारत का दायरा महज़ 70 साल का है और सीमा पर जाकर ख़त्म हो जाता है, लेकिन हजारों साल का सांस्कृतिक भारत सरहदों के बंधन को नहीं मानता ।
कांग्रेस नेता और पंजाब सरकार के मंत्री नवजोत सिंह सिद्धू ख़बरों में बने रहते हैं. उनकी बयानबाज़ी उन्हें चर्चाओं और विवादों में रखती है. बीते अगस्त में वे पाकिस्तान के नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री और अपने दोस्त इमरान खान की ताजपोशी में गए थे।

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इसी दौरान वे पाक सेना अध्यक्ष क़मर जावेद बाजवा से बड़ी मोहब्बत और ख़ुलूस से गले मिले. इसके बाद नवजोत सिंह सिद्धू ने कहा था, ‘मैं एक मुहब्बत का पैग़ाम हिन्दुस्तान से लाया था. जितनी मुहब्बत मैं लेकर आया था उससे 100 गुना ज़्यादा मुहब्बत मैं लेकर जा रहा हूं।

जो वापस आया है, वो सूद समेत आया है.’ बाजवा से उनके गले मिलने पर हंगामा हो गया था. भाजपा से लेकर उनकी अपनी पार्टी कांंग्रेस तक ने इस मुद्दे पर उनसे किनारा कर लिया था.

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ताज़ा विवाद पिछले हफ़्ते कसौली में हुआ. सिद्धू यहां खुशवंत सिंह लिटरेचर फेस्टिवल में आए थे. इसी दौरान वे कह गए कि तमिलनाडु के बनिस्बत वे पाकिस्तान की संस्कृति से जुड़ाव महसूस करते हैं. उन्होंने कहा कि जब वे तमिलनाडु जाते हैं तो भाषा तक नहीं समझ पाते और खान-पान भी बिल्कुल बदल जाता है. लेकिन पाकिस्तान जाने पर ऐसा नहीं होता.

 
बस फिर क्या था. हंगामा उठ खड़ा हुआ. नवजोत सिंह सिद्धू विपक्ष के निशाने पर आ गए. सोशल मीडिया पर भी उनकी ट्रोलिंग होने लगी. पाकिस्तान चले जाओ सहित कई तरह के फिकरे कसे गए. आप कैसे पाकिस्तान की तरफ़दारी कर सकते हैं और कैसे तमिलनाडु के लोगों को आहत कर सकते हैं? आख़िर देश नाम की भी कोई चीज़ है कि नहीं?

 

इस विवाद पर हमने लोगों की व्यक्तिगत राय जाननी चाही. मामला संवेदनशील है और इनमें से कुछ ऐसा चाहते थे, इसलिए इन सभी लोगों के नाम बदल दिये गये हैं.

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दक्षिण भारत से ताल्लुक रखने वालीं भारती एम पेशे से इंजीनियर हैं और गुड़गांव की एक टेलिकॉम कंपनी में काम करती हैं. वे कहती हैं, ‘खाने में चावल के साथ मुझे सांभर पसंद है, न कि राजमा. मेरे उत्तर भारतीय मित्र बोलने के लहजे पर मेरी टांग खींचते हैं. अब क्या मैं और मेरे दोस्त एंटीनेशनल हैं?’ उधर, आईआईएम से पढ़े और नोएडा में रह रहे अभिरूप चक्रवर्ती का कहना है कि बंगाली होने के नाते वे बांग्लादेशियों से ज़्यादा समानता रखते हैं बजाय पंजाबियों या तमिलों के. राजस्थान सरकार के के लिए काम करने वाले सतबीर सिंह सिख भी कुछ-कुछ ऐसी ही बात कहते हैं।

 

उनके मुताबिक सीमा के दोनों तरफ़ के पंजाबी बाशिंदे एक जैसे हैं. वे कहते हैं, ‘खानपान एक जैसा है, गीत संगीत एक जैसा है, तीज त्यौहार एक जैसे हैं. तो फिर क्यों नहीं दोनों तरफ़ के पंजाबी लोग एक-दूसरे से ज़्यादा जुड़ाव महसूस करेंगे?’

 

इन तीनों को नवजोत सिंह सिद्धू की बात ग़लत नहीं लगती. बहुतों को लग सकती है. पर जिनको ग़लत लगती है उन्हें जॉन स्ट्रेची की बात पर एतराज़ क्यों नहीं होता? जॉन स्ट्रेची ब्रिटिश इंडिया के आईसीएस अफसर थे जिन्होंने ‘इंडिया’ नाम की अपनी एक क़िताब में लिखा था।

 

‘भारत एक देश नहीं है. ये कई देशों से मिलकर बना हुआ महाद्वीप है. स्पेन और इंग्लैंड में समानता हो सकती है, बंगाल और पंजाब में बिलकुल भी नहीं है.’ उनकी इस बात की चोट दिल पर क्यों नहीं लगती? अगर ऐसा होता तो अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में लगी मुहम्मद अली जिन्ना की तस्वीर के विवाद से पहले यूनिवर्सिटी के स्ट्रेची हॉल पर विवाद होता.

 
हमारे हुक्मरान और हम सभी मुद्दों को अलग-अलग चश्मे से देखते हैं. ‘इलाहाबाद’ से तकलीफ़ है, लेकिन शहर का नाम ‘डलहौज़ी’ होने पर दिक्कत नहीं है. औरंगज़ेब रोड से एतराज़ था पर चेल्म्स्फोर्ड रोड से गुरेज़ नहीं।

 

लोगों को सिद्धू का पाकिस्तानी फ़ौजी अफसर से गले मिलना रास नहीं आया क्योंकि उसके सीने पर तो भारतीयों को मारने लिए मिले मेडल टंगे हुए हैं. पर दूसरी तरफ़ यही लोग जब रॉ के पूर्व अध्यक्ष आरएस दुलत और पाकिस्तानी आईएसआई के चीफ़ असद दुर्रानी के बैठकर शराब पीने के किस्सों का ज़िक्र, दोनों के द्वारा लिखी गयी क़िताब ‘स्पाई क्रॉनिकल्स’ में पढ़ते हैं, तो ‘चियर्स’ कह उठते हैं.।

 

सिद्धू ने जो किया वह ‘एंटीनेशनल है.’ दुलत साहब ने जो किया वह ‘ट्रैक 2 डिप्लोमेसी’ है. और मोदी जी और वाजपेयी जी जो कर चुके हैं वह स्टेट्समैनशिप है.

 

अगर नवजोत सिंह सिद्धू के बयान को ध्यान से पढ़ा जाए तो समझ में आता है कि वे भौगौलिक भारत की बात नहीं कर रहे थे. वे सांस्कृतिक भारत का ज़िक्र कर रहे थे. भौगौलिक भारत का दायरा महज़ 70 साल का है और सीमा पर जाकर ख़त्म हो जाता है।

 

सांस्कृतिक भारत का फैलाव हज़ारों साल का है और सरहदों के पार जाता है. संस्कृति कोई मंटो का किरदार ‘टोबा टेक सिंह’ नहीं है जो ‘ओपड दी गड-गड दि अनैक्स दि बेद्याना दि मूंग दि दाल ऑफ़ टोबा टेक सिंह’ कहते हुए बॉर्डर के तारों पर झूलकर ख़त्म हो जाए. वह आबो-हवा से बनती है, तीज-त्योहारों में पलती है।

 

 

बोलियों और जुबानों में पनपती है, नदियों के, झीलों के, नहरों के पानियों के सहारे बढ़ती है. सिद्धू का बयान भौगोलिक भारत की महत्ता को कम नहीं करता, सांस्कृतिक भारत की उम्र बढ़ाता है.

ठीक इसी तरह, स्वामी सानंद महज़ गंगा के पानी को बचाने की बात नहीं कर रहे थे. गंगा हमारी संस्कृति है. वे संस्कृति बचाने की गुहार लगा रहे थे. हमें सिद्धू के बयान से तकलीफ़ है, स्वामी सानंद की प्राणाहुति हमें उद्वेलित नहीं करती. जैसे हम, वैसे हमारे हुक्मरान.

कल नवजोत सिंह सिद्धू का जन्मदिन था. उनके लिए अकबर प्रयागराजी की ग़ज़ल का शेर – नातजुर्बाकारी से वाइज़ की ये बातें है, उस रंग को क्या जाने, पूछा जो कभी पी है’. अकबर इलाहाबादी साहब से माफी अब ऊपर जाकर ही मिलेगी न? पर उनका सरनेम तो अजय सिंह बिष्ट की वजह से बदला है. मेरी क्या ग़लती है? अरे, सरनेम से याद आया कि पाकिस्तान में ‘बाजवा’ मुसलमान हैं, इधर हिंदू और सिख.

हंगामा है क्यूं बरपा थोड़ी सी जो…

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