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झारखण्ड: लॉकडाउन के बीच राज्य से गायब हो गए 116 बच्चे,सबसे ज्यादा लड़कियां,तस्करी की आशंका ।

झारखंड राज्य का गठन हुए 20 वर्ष हो चुके हैं. बावजूद इसके राज्य सरकार मानव तस्करी रोक पाने में नाकाम रही है. रांची, खूंटी, धनबाद,हजारीबाग,पूर्वी सिंहभूम ज़िलों से बड़ी तादाद में लड़कियां गायब हो रही है. खनिज संपदा होने के बावजूद झारखंड की जनता गरीबी का दंश झेल रही है. पिछड़े एवं आदिवासी समुदायों को न तो ढंग से शिक्षा मिल पा रही है और न रोजगार के अवसर. लिहाजा रा़ेजगार के नाम पर कई प्लेसमेंट एजेंसियां झारखंड के ग्रामीण-आदिवासी बाहुल्य इलाकों की अशिक्षित, कम पढ़ी-लिखी युवतियों एवं किशोरियों एवं नाबालिक बच्चे को बड़े शहरों और महानगरों की राह दिखाती है ।

सस्ते श्रम की मांग का सबसे खराब नतीजा मानव तस्करी के रूप में सामने आ रहा है. इस मामले में झारखंड सरीखे राज्यों की हालत बदतर है, जहां तमाम कोशिशों के बावजूद मानव तस्करी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा. झारखंड मानव तस्करी में देश के अग्रणी राज्यों में से एक है ।

हाल के दिनों में मासूमों को लेकर जताई गई आशंकाएं सच साबित हो रही हैं। झारखंड के गरीब बच्चों पर लॉकडाउन कहर बनकर टूटा है। गांवों से बच्चों के के गायब होने की रफ्तार तेज हो गई है। 1 मार्च से लेकर 15 जून के बीच झारखंड से 116 बच्चे गायब हो गए हैं। औसतन एक बच्चा प्रतिदिन गायब हुआ। आशंका है कि लॉकडाउन के दौरान ये बच्चे मानव तस्करों के आसान शिकार बने हैं। सबसे खतरनाक बात तो ये है कि इनमें से 89 लड़कियां हैं।

आंकड़ों की मानें तो राज्य के तीन जिलों में सबसे ज्यादा बच्चे गायब हुए हैं। हजारीबाग में 27 बच्चे गायब हुए हैं जिनमें 17 लड़कियां और 10 लड़के शामिल हैं। उसी प्रकार धनबाद में 23 बच्चे गायब हुए, जिनमें 19 लड़कियां और चार लड़के हैं। पूर्वी सिंहभूम में 21 बच्चे मिसिंग हैं जिनमें 19 लड़कियां और दो लड़के शामिल हैं। हालांकि रांची समेत सात जिले ऐसे हैं जहां इस बीच एक भी बच्चा गायब नहीं हुआ है।

गौरतलब है कि हाल के दिनों में राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ने आशंका जाहिर की थी कि लॉकडाउन से उभरी परिस्थितियों में मजदूरी के साथ-साथ देह व्यापार के लिए लड़कियों की तस्करी हो सकती है। ऐसे में इस संभावना को बल मिल रहा है कि राज्य से गायब हुए बच्चों को तस्करी कर बाहर के राज्यों में बेचा जा सकता है। हैरत की बात यह है कि लॉकडाउन के दौरान आवागमन के सारे ससाधान बंद थे। इसके बावजूद इतनी बड़ी संख्या में बच्चे अपने गांव-घरों से गायब हुए हैं।

बीते साल गायब हुए 148 बच्चों का सुराग नहीं।
2019 में राज्य के अलग अलग हिस्सों से गायब हुए 148 बच्चों का सुराग नहीं मिल पाया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, बीते साल 201 लड़के व 176 लड़कियों के गायब होने या अपहरण का मामला दर्ज कराया गया था। इस तरह कुल 377 बच्चों के गायब होने की शिकायत दर्ज की गई थी। लेकिन पुलिस ने 126 लड़के व 123 लड़कियों समेत कुल 229 बच्चों को बरामद किया। लेकिन 148 बच्चों का सुराग पिछले साल नहीं मिल पाया था। पुलिस को हजारीबाग से 19, देवघर से 17, धनबाद से 16, लोहरदगा से 15, रांची से 9 बच्चों का सुराग नहीं मिल पाया है। रेल जमशेदपुर में भी बीते साल 11 बच्चों के गायब होने की शिकायत दर्ज की गई थी, लेकिन एक भी बच्चा बरामद नहीं किया गया।

तस्करी मामलों में अब तक की कार्रवाई : 
राज्य से गायब लड़कियों को बड़े पैमानें पर प्लेसमेंट एजेंसी के जरिए महानगरों में बेचा जाता है। लेकिन साल 2015 से 2019 के बीच ट्रैफिकिंग को लेकर बड़ी कार्रवाईयां हुई हैं। 2015 से 2019 तक ट्रैफिकिंग के 490 केस एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट थानों में दर्ज किए गए हैं। पुलिस ने इस दौरान 131 पुरुष व 585 महिलाओं समेत 716 लोगों का रेस्क्यू कराया। वहीं पुलिस ने पांच सालों में 139 महिला ट्रैफिकर समेत कुल 539 ट्रैफिकर को गिरफ्तार किया है।

कहाँ से कितने गायब :

सबसे अधिक हजारीबाग से जहां से कुल 27 बच्चे गायब हैं जिसमे 17 लड़कियां और 10 लड़के शामिल है ।
धनबाद से कुल 23 बच्चे गायब हैं जिसमे 19 लड़कियां और 4 लड़के शामिल है ।
इसी तरह पूर्वी सिंहभूम से कुल 21 में 19 लड़कियां 2 लड़के ,देवघर से कुल 7 में 3 लड़कियां 4 लड़के ,दुमका से 2 लड़कियां 1 लड़के,गिरिडीह से 3 लड़कियां,गोड्डा से 2 लड़कियां,बोकारो से एक लड़के,साहेबगंज से 1 लड़की और 1 लड़के,पश्चिमी सिंहभूम से 2 लड़के,गढ़वा से 5 लड़कियां ,पलामू से 6 लड़कियां 1 लड़के,गुमला से 7 लड़कियां,कोडरमा से 1 लड़का,सिमडेगा से 1 लड़की,रामगढ़ से 1 लड़का,लोहरदगा से 3 लड़कियां ।
इसके अलावे शेष जिलों में आंकड़ा शून्य है ।

अगर ये खबर मीडिया में नही आती तो ये बातें दबी ही रह जाती,उन मीडिया बंधु को धन्यवाद खबर को बाहर लाने के लिए ,जिस तरह बेरोजगारी ,गरीबी के कारण बच्चे की तस्करी हो रही है ये चिंता की विषय है ,इसपर सरकार को तुरंत संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए,इसके अलावे ग्रामीण क्षेत्रों में इसको लेकर व्यापक प्रचार प्रसार और जागरूकता फैलाने की भी जरूरत है ,तभी ऐसे मामलों पर विराम लगेगा ।

बंदना दुबे (बच्चों पर काम कर रही ,मानव सेवा से सम्मानित अनाथ आश्रम की संचालिका )
हाल के दिनों जांच के दौरान यह बातें सामने आई है कि,अभी बच्चों की तस्करी में बढ़ोतरी हुई है,गरीबी और अशिक्षा इसका मूल कारण है ।इसके लिए एक नीति बनाने की जरूरत है,अगर ऐसा नही हुआ तो बाल तस्करी और बढ़ सकती है ।

रूपा कुमारी (अध्यक्ष बाल संरक्षण समिति, रांची)
लॉकडाउन में प्रवासी मजदूरों के साथ बड़ी संख्यां में बच्चे भी लौटे हैं ,अब उनके पास रोजगार की कमी आई है ,ऐसे में तस्कर उसके मजबूरी का गलत फायदा उठा कर उसे गलत कामो की ओर धकेल रहा है । बेरोजगारी के कारण ही आसानी से ऐसे लोग चंगुल में फंस रहे हैं ।

संजय मिश्रा (सदस्य निगरानी समिति राष्ट्रीय बाल संरक्षण आयोग ।)

 

 

इनपुट:हिंदुस्तान

About मैं हूँ गोड्डा (कार्यालय)

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