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इस्मत ने तोड़ दी थीं बेड़ियां इसीलिए कहलाईं सबसे विवादित लेखिका,गूगल ने डूडल लगाकर दिया श्रद्धांजलि ।

संस्कृति अगर इस्मत चुगताई और मंटो को लेकर ये अफवाह सच हो जाती, तो क्या सच में कयामत आ जाती !

तोड़ दी थीं बेड़ियां इसीलिए कहलाईं सबसे विवादित लेखिका 

बेबाकी और अश्लीलता में उतना ही फर्क है जितना भाई का बहन के सर को सहलाते हुए समझाने में और किसी पराए मर्द का उसको जबरदस्ती छूने में। जहां बेबाकी किसी संकुचित विचार से पर्दा उठाने जैसा है वहीं अश्लीलता कपड़े फाड़ने जैसा। बेबाकी इशारा है तो अश्लीलता घिनौनी हरकत। लेकिन इतने बड़े अंतर के बाद भी लोगों के लिए बेबाकी और अश्लीलता में फर्क करना बहुत कठिन हो जाता है। मंटो की कहानियां बेबाक हैं और मस्तराम की अश्लील इसीलिए मंटों पाठकों की बुकसेल्फ पर मिलेंगे और मस्तराम गद्दे के नीचे।

अश्लील लिखना आसान है लेकिन बेबाक लिखना बहुत ही मुश्किल। यही वजह है कि साहित्य में बेबाक लिखने वाले लेखक बहुत कम हुए हैं। और अगर बेबाक लेखन में बात महिला लेखिका की हो रही हो तो फिर आप उन्हें उंगलियों पर गिन सकते हैं। आज तो लोगों की सोच काफी ऊपर उठी है मगर एक दौर वो भी था जब पर्दे में छुपे छुपे औरतें अपनी ही शक्ल भूल जाया करती थीं। वो अपनी ही हंसी नहीं सुन पाती थीं तो बेबाक लिखना बहुत दूर की बात है। लेकिन इसी दौर में एक लेखिका ने जन्म लिया था समाज के ऊपर चढ़े शराफत के पर्दे को उठा कर बेबाकी से सच लिखने के लिए। नाम था इस्मत चुगताई। वही इस्मत चुगताई जिन्होंने लिहाफ नामक कहानी लिख कर इस तथाकथित सभ्य समाज की एक छुपी हुई तस्वीर को आइना बना कर पेश किया था।

इस्मत चुगताई ने अपनी ये सबसे विवादास्पद अपनी शादी से दो महीने पहले लिख ली थी। कहानी लिखने के दो साल बाद इस पर अश्लीलता के आरोप लगे। यह कहानी एक हताश गृहिणी की थी जिसके पति के पास समय नहीं है और यह औरत अपनी महिला नौकरानी के साथ में सुख पाती है। दो साल तक केस चला, बाद में खारिज कर दिया गया।

आधुनिक उर्दू अफसानागोई के चार आधार स्तंभ माने जाते हैं, जिनमें मंटो, कृशन चंदर, राजिंदर सिंह बेदी और चौथा नाम इस्मत चुगताई का आता है। 21 अगस्त, 1915 को जन्मीं इस्मत चुगताई उर्फ इस्मत आपा का नाम भारतीय साहित्य में एक चर्चित और सशक्त कहानीकार के रूप में विख्यात है। जिस जमाने में औरतों के मन में उठे विचार वहीं दफन हो कर रह जाते थे उस दौर में इस्मत चुगताई ने समाज में उठने वाली उंगलियों की परवाह किये बिना न केवल महिलाओं से जुड़े मुद्दों को अपनी रचनाओं में बेबाकी से उठाया बल्कि पुरुष प्रधान समाज में उन मुद्दों को चुटीले और संजीदा ढंग से पेश करने का जोखिम भी उठाया। आलोचकों के अनुसार इस्मत चुगताई ने शहरी जीवन में महिलाओं के मुद्दे पर सरल, प्रभावी और मुहावरेदार भाषा में ठीक उसी प्रकार से लेखन कार्य किया है, जिस प्रकार से प्रेमचंद ने देहात के पात्रों को बखूबी से उतारा है। इस्मत के अफ़सानों में औरत अपने अस्तित्व की लड़ाई से जुड़े मुद्दे उठाती है।

गूगल ने डूडल लगाकर दिया सम्मान
गूगल ने डूडल लगाकर दिया सम्मान

भाई का मिला साथ 

इस्मत चुगताई का जन्म बदायूं, उत्तर प्रदेश में हुआ था। इस्मत अपने माता पिता की दस संतानों में से नौवें नंबर की संतान थीं। वो छः भाई तथा चार बहने थीं। उनके पिता सविल सर्विस में थे जिस कारण उनका जगह जगह स्थानांतरण होता रहा और यही वजह रही कि उन्हें शहरों के बदलने के साथ अपने घर भी बदलने पड़े। लेकिन उनका बचपन अधिकांशत: जोधपुर में ही व्यतीत हुआ। चूंकि इस्मत की सभी बहनें बड़ी थीं इस कारण वो जब तक कुछ बड़ी हुईं तब तक उनकी बहनों की शादी हो चुकी थी। इसके बाद उन्हें साथ मिला तो अपने भाइयों का। इस्मत के लहजे की बेबाकी और बातों में खुलापन इसी दौर की देन थी  जीवन का वह समय काफी महत्त्वपूर्ण सिद्ध हुआ, जो इन्होंने अपने भाइयों के साथ व्यतीत किया। इनके भाई मिर्जा आजिम बेग चुगताई पहले से ही एक जाने-माने लेखक थे। इस प्रकार इस्मत चुग़ताई को किशोरावस्था में ही भाई के साथ-साथ एक गुरु भी मिल गया था।

इस्मत चुगताई ऐसा कारनामा करने वाली पहली मुस्लिम महिला थीं 

इस्मत चुगताई को बी.ए और बी.टी (बैचलर्स इन एजुकेशन) करने वाली पहली मुस्लिम महिला के रूप में भी जाना जाता है। अपनी शिक्षा पूर्ण करने के साथ ही इस्मत चुगताई लेखन क्षेत्र में आ गई थीं। उन्होंने अपनी कहानियों में स्त्री चरित्रों को बेहद संजीदगी से उभारा और इसी कारण उनके पात्र ज़िंदगी के बेहद करीब नजर आते हैं। इस्मत चुग़ताई ने ठेठ मुहावरेदार गंगा-जमुनी भाषा का इस्तेमाल किया, जिसे हिन्दी-उर्दू की सीमाओं में कैद नहीं किया जा सकता। उनका भाषा प्रवाह अद्भुत था। इसने उनकी रचनाओं को लोकप्रिय बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस्मत चुग़ताई अपनी ‘लिहाफ’ कहानी के कारण खासी मशहूर हुईं। उन्होंने 1942 में फिल्म डायरेक्टर और स्क्रिप्टराइटर शाहिद लतीफ से निकाह कर लिया। उनकी लिखी गई इस कहानी में उन्होंने महिलाओं के बीच समलैंगिकता के मुद्दे को उठाया था। उस दौर में किसी महिला के लिए यह कहानी लिखना एक दुस्साहस का काम था। इस्मत को इस दुस्साहस की कीमत चुकानी पड़ी, क्योंकि उन पर अश्लीलता का मामला चला। आलोचकों के अनुसार उनकी कहानियों में समाज के विभिन्न पात्रों का आईना दिखाया गया है।

इस्मत ने महिलाओं को असली जुबान के साथ अदब में पेश किया। उर्दू जगत् में इस्मत के बाद सिर्फ सआदत हसन मंटो ही ऐसे कहानीकार थे, जिन्होंने औरतों के मुद्दों पर बेबाकी से लिखा। इस्मत का कैनवास काफ़ी व्यापक था, जिसमें अनुभव के रंग उकेरे गए थे। ऐसा माना जाता है कि ‘टेढ़ी लकीर’ उपन्यास में इस्मत ने अपने जीवन को ही मुख्य प्लाट बनाकर एक महिला के जीवन में आने वाली समस्याओं को पेश किया।

‘टेढ़ी लकीर’ के बारे में 

‘फ़ायर’ और ‘मृत्युदंड’ जैसी फ़िल्मों के किरदार तो परदे पर नज़र आते हैं, लेकिन इस्मत ने उन्हें कहीं पहले गढ़कर अपने उपन्यासों में पेश कर दिया था। समलैंगिक रिश्तों पर नहीं, उसके कारणों पर उर्दू जगत् में पहली बार इस्मत ने ही लिखा। यूँ तो उन्होंने ‘जिद्दी’, ‘लिहाफ’, ‘सौदाई’, ‘मासूमा’, ‘एक क़तरा खून’ जैसे कितने ही उपन्यास लिखे, किंतु सबसे ज़्यादा मशहूर और जिसका विरोध हुआ, वह ‘टेढ़ी लकीर’ है। 1944 का उपन्यास ‘टेढ़ी लकीर’ ऐसे परिवारों पर व्यंग्य है जो अपने बच्चों की परवरिश में कोताही बरतते हैं और नतीजे में उनके बच्चे प्यार को तरसते, अकेलेपन को झेलते एक ऐसी दुनिया में चले जाते हैं, जहां जिस्म की ख्वाहिश ही सब कुछ होती है।

इस्मत चुगताई ने ‘टेढ़ी लकीर’ के ज़रिये समलैंगिक रिश्तों को एक रोग साबित करके उसके कारणों पर नज़र डालने पर मजबूर किया। लेकिन तब के लोगों ने उनकी बातों को लेकर उनका विरोध किया, जबकि सच्चाई यह थी कि उन्होंने अपने किरदार के ज़रिये यह बताया कि एक बच्चे का अकेलापन, प्यार से महरूम और उसको नज़रअंदाज़ करना किस तरह एक बीमारी का रूप ले लेता है। उन्होंने इसे बीमारी बताकर नफरत के बदले प्यार, अपनापन निभाने की सीख ‘टेढ़ी लकीर’ के माध्यम से दी।

मंटो और इस्मत को ले कर उड़ी अफवाह 

उनकी पीढ़ी के लेखको में कृशन चन्दर, राजेन्द्र सिंह बेदी  और इस्मत चुगताई शामिल थीं। इस्मत से उनकी नोकझोक उर्दू साहित्य में बहुत मशहूर हुई। कुछ लोग तो उन दोनों के निकाह के बारे में अफवाहें उड़ा चुके थे। लोगो का यह कहना था कि अगर यह हादसा होता तो कयामत हो जाती। दोनो अपनी बदमिजाजी और बोल्डनेस के लिए बदनाम थे। लेकिन दोनों विभाजन के अजाब से दुखी थे। मंटो कहते थे कि मत कहो हजारो हिन्दू मारे गए या हजारो मुसलमान शहीद हुए , यह कहो कि हजारो इंसान मारे गए।

इस्मत चुग़ताई ने ‘कागजी हैं पैरहन’ नाम से एक आत्मकथा भी लिखी थी। उनकी अन्य रचनाएँ इस प्रकार हैं-

इस्मत चुगताई के जंगली कबूतर, टेढी लकीर, जिद्दी, एक कतरा ए खून, मासूमा, दिल की दुनिया, बांदी, बहरूप नगर, सैदाई, चोटें, छुईमुई, एक बात, कलियां, एक रात आदि उपन्यास खूब चर्चित रहे।

इस्मत चुगताई को ‘गालिब अवार्ड’ (1974) – ‘टेढ़ी लकीर’ के लिए, ‘साहित्य अकादमी पुरस्कार’ ‘इक़बाल सम्मान’ ‘नेहरू अवार्ड’ ‘मखदूम अवार्ड’ जैसे पुरस्कारों से सम्मानित किया गया।

और वो खामोश हो गईं

24 अक्टूबर, 1991 में मुंबई (महाराष्ट्र) इस्मत चुगताई हमेशा के लिए खामोश हो गईं। भले ही इस्मत चुगताई हमेशा के लिए खामोश हो गई हों लेकिन उनकी कहानियां आज भी बोलती हैं और हमेशा बोलती रहेंगी। आज उनके जन्मदिवस पर गूगल ने डूडल लगा कर अपने चिरपरिचित अंदाज में उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की है।

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