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सचिन की नजर में कौन है दुनियां का सबसे सुंदर क्रिकेट मैदान ?

लॉर्ड्स नहीं, न्यूलैंड्स नहीं, ईडन गार्डन्स नहीं। और वानखेड़े से सचिन को प्यार चाहे जितना हो, वो एक सुंदर मैदान तो हरगिज़ नहीं।

सचिन सोचते थे कि दुनिया का सबसे ख़ूबसूरत क्रिकेट मैदान है डर्बीशायर में चेस्टरफ़ील्ड का “क्वीन्स पार्क।”

ये कौन-सा क्रिकेट मैदान है?

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इंग्लैंड में छह प्रमुख टेस्ट वेन्यू हैं-

लंदन में लॉर्ड्स और ओवल, मैनचेस्टर में ओल्ड ट्रैफ़र्ड, लीड्स में हेडिंग्ले, बर्मिंघम में एजबेस्टन और नॉटिंघम में ट्रेंट ब्रिज।

इनके अलावा कार्डिफ़, साउथैम्प्टन, चेस्टर ली स्ट्रीट में भी यदा-कदा टेस्ट मैच होते हैं। काउंटी क्रिकेट खेलने वाले मैदान तो बीसियों हैं। इनमें से बहुतेरे ऐसे भी हैं, जहां पर केवल एक ही अंतरराष्ट्रीय मैच खेला गया, जैसे कि टनब्रिज वेल्स, जहां पर 1983 के विश्वकप का वो मैच खेला गया था, जिसमें कपिल देव ने 175 रन बनाए थे।

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किंतु चेस्टरफ़ील्ड का “क्वीन्स पार्क?” यह कौन-सा मैदान है। अकेले डर्बीशायर काउंटी में ही 21 क्रिकेट ग्राउंड्स ऐसे हैं, जहां कभी ना कभी कोई प्रथम श्रेणी मैच खेला गया हो। इनमें डर्बीशायर काउंटी का अधिकृत खेल मैदान काउंटी ग्राउंड है। चेस्टरफ़ील्ड किसी ज़माने में डर्बीशायर का खेल मैदान हुआ करता था। यानी आज की तारीख़ में वहां अंतरराष्ट्रीय खेल मुक़ाबले तो क्या, प्रथम श्रेणी के मैच भी नहीं होते। किंतु क्रिकेट की दुनिया के महानतम बल्लेबाज़ का पसंदीदा मैदान!

वर्ष 1992 में उन्नीस साल के सचिन ने पूरा एक साल काउंटी क्रिकेट खेला था। यॉर्कशायर के लिए। तब वे यॉर्कशायर के लिए खेलने वाले पहले विदेशी खिलाड़ी बने थे। सचिन ने एक सीज़न में कोई हज़ार रन बनाए। इस सिलसिले में पूरे इंग्लैंड के काउंटी मैदानों का फेरा लगाया। और तब एक दिन वे चेस्टरफ़ील्ड के “क्वीन्स पार्क” में पहुंचे और मंत्रमुग्ध रह गए।

उस दिन महान अम्पायर डिकी बर्ड भी सचिन के साथ थे। डिकी ने अपनी किताब “व्हाइट कैप एंड बेल्स”, जो कि उनके प्रिय खेल मैदानों का एक रोचक वृत्तांत है, में लिखा है कि सचिन “क्वीन्स पार्क” को देखते ही रह गए। वहां सलीक़ेदार दर्शक दीर्घा तक नहीं थी, और खिलाड़ियों के लिए महज़ एक छोटा-सा पॅविलियन भर था। किंतु सदाबहार वृक्षों का एक घेरा पूरे मैदान को बांधे हुए था, सुपरिचित “इंग्लिश समर” अपने पूरे वैभव पर थी और वृक्षों में फूल खिले थे। दरख़्तों के झुरमुट से ऑल सेंट्स चर्च का मशहूर “क्रुकेड स्पाइर” यानी ऐंठदार शिखर गर्दन निकाले दिखाई देता था।

सचिन ने कहा, “डु यू नो डिकी, आई हैव नेवर सीन अ मोर ब्यूटीफ़ुल क्रिकेट सेटिंग दैन दिस।” डिकी ने अपनी किताब में लिखा है, मास्टर बल्लेबाज़ से असहमत होने का मेरे पास कोई कारण नहीं था।

क्रिकेट का खेल अब इतना बड़ा हो गया है कि ऐसे खुले, हवादार, हरे-भरे, लगभग देहाती मैदानों में अब अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबले नहीं हो सकते, क्योंकि क्रिकेटिंग प्रोटोकॉल के मानकों पर वे खरे नहीं उतर सकते। जबकि क्रिकेट देखने का ख़ालिस अंग्रेज़ी मिज़ाज यह है कि धूप में घास पर बैठकर दिन-दिनभर उम्दा क्रिकेट की दावत उड़ाई जाए और हर अच्छे स्ट्रोक पर भद्रता से ताली बजाई जाए, क्लासिकी संगीत की तरह! दोज़ इंग्लिश मैनर्स!

बात केवल क्वीन्स पार्क की ही नहीं, इंग्लैंड में ही बक्सटन, बर्टन-ऑन-ट्रेंट, हेनर जैसे और भी ऐसे खेल मैदान हैं, जो अब लगभग अनुपयोगी मान लिए गए हैं।

इनमें कैंटरबेरी के “सेंट लॉरेंस ग्राउंड” को कौन भूल सकता है, जिसके भीतर लाइम का एक दरख़्त लहलहाता था और गेंद के उससे टकराने पर उसे बाउंड्री मान लिया जाता था। अब वो पेड़ भी धराशायी हो चुका है और “सेंट लॉरेंस” में भी अब ना के बराबर क्रिकेट मैच खेले जाते हैं।

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