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छठ व्रत विशेष : तब से अब तक ये सभी बदलाव आए छठ व्रत में, एक नहीं बदली तो वो आस्था जो इसे महापर्व बनाती है।

छठ को आस्था का महापर्व कहा जाता है क्योंकि यहां हर बात आस्था से जुड़ी है। लेकिन बदलते दौर के साथ आस्था में कुछ बदलाव भी आये हैं। कुछ बदलाव मजबूरियों के कारण आये तो कुछ सहूलतों और असहजता के कारण बदल गए। आइए एक नजर डालते हैं आस्था में आए इन सभी बदलावों पर।

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समय के साथ साथ लोग बदल गए, उनका रहन सहन तथा ठिकाना भी बदल गया। कईयों को तो अपनी मिट्टी की सुगंध लिए वर्षों बीत गए लेकिन नहीं बदले तो इस पर्व को लेकर उनके संस्कार। मिट्टी से जुड़े लोग विदेशों तक में छठ पूजा धूम धाम से मना रहे हैं।

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बिहार से उठ कर भारत के अन्य राज्यों में जा बसे लोग भी छठ पूजा मानाने में पीछे नहीं हटते। लेकिन असल मायने में ये पूजा जमीन की है इसे आप कंक्रीट के फर्श, बहुमंजिला इमारतों की छत इत्यादि पर करना चाहेंगे तो नियमों में कुछ न कुछ बदलाव तो आना तो निश्चित है।
छठ व्रत में गंगा का बहुत महत्व है। सूर्य को अर्घ गंगा घाट पर दिया जाता था। खरना के प्रशाद के लिए गंगा नदी का पानी ही प्रयोग में लाया जाता था। मगर हर जगह तो गंगा नदी पहुंच नहीं सकती इसीलिए श्रद्धालुओं ने अन्य नदियों का घाट सजाना शुरू कर दिया।

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खरना का प्रशाद भी इसी नदी के पानी से बनता है। इसी तरह नदियाँ तालाब में बदल गईं तो तालाबों की जगह कुओं ने ले ली, अब तो ये आलम है कि लोग गड्ढा खोद कर या फिर टब में पानी भर कर उसमें खड़े हो कर सूर्य को अर्घ दे देते हैं।

और खरना के प्रशाद के लिए जहां पहले गंगा या फिर अन्य नदियों का पानी उपयोग में लाया जाता था वहीं अब नल का पानी प्रयोग किया जाता है
आस्था के इस महापर्व छठ में सबसे ज्यादा मान्यता है पवित्रता की। इसी को ध्यान में रखते हुए खरना का प्रशाद तथा ठेकुआ कसार इत्यादि भोग नियमानुसार मिट्टी के नए चूल्हे पर बनाए जाते हैं तथा जलावन के लिए केवल आम की लकड़ी का ही प्रयोग होता है।

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मगर समय के साथ मिट्टी के चूल्हों से लोग ईंट के चुल्हे व आम लकड़ियों के जलावन से होते हुए नए स्टोव तक पहुंचे और अब आप शहरों में देखें कि लोग व्रत का सारा सामान अपने गैस चूल्हे पर ही बनाते हैं।

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आपको बता दें कि व्रत नियम के अनुसार अर्घ या खरना पूजा के समय व्रत करने वाले लोग ऐसा कपडा नहीं पहनते जो सिला हुआ हो। इसके पीछे आम जन की ये धरना है कि जब दर्जी कपड़े सिलते हैं तो धागे को सुई में डालने के लिए पहले उसे मुंह से लगते हैं। इस तरह सिला हुआ वस्त्र जूठा और अपवित्र हो जाता जिसे छठी मईया की पूजा अर्चना के समय नहीं पहना जा सकता। लेकिन समय के साथ साथ ये धारणा अब बदल रही है।

शहरों से लेकर गाँवों तक अब लोग सिले कपड़ों के साथ अर्घ देते हैं। वे युवतियां जिनका नया नया विवाह हुआ है वो तो पूरे श्रृंगार के साथ अर्ध्य देती है।

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छठ व्रत विशेष :- तब से अब तक ये सभी बदलाव आए छठ व्रत में, एक नहीं बदली तो वो आस्था जो इसे महापर्व बनाती है।

छठ को आस्था का महापर्व कहा जाता है क्योंकि यहां हर बात आस्था से जुडी है। लेकिन बदलते दौर के साथ आस्था में कुछ बदलाव भी आये हैं। कुछ बदलाव मजबूरियों के कारण आये तो कुछ सहूलतों और असहजता के कारण बदल गए। आइए एक नजर डालते हैं आस्था में आए इन सभी बदलावों पर।

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समय के साथ साथ लोग बदल गए, उनका रहन सहन तथा ठिकाना भी बदल गया। कईयों को तो अपनी मिट्टी की सुगंध लिए वर्षों बीत गए लेकिन नहीं बदले तो इस पर्व को लेकर उनके संस्कार। मिट्टी से जुड़े लोग विदेशों तक में छठ पूजा धूम धाम से मना रहे हैं। बिहार से उठ कर भारत के अन्य राज्यों में जा बसे लोग भी छठ पूजा मानाने में पीछे नहीं हटते।

 

लेकिन असल मायने में ये पूजा जमीन की है इसे आप कंक्रीट के फर्श, बहुमंजिला इमारतों की छत इत्यादि पर करना चाहेंगे तो नियमों में कुछ न कुछ बदलाव तो आना तो निश्चित है।

 

छठ व्रत में गंगा का बहुत महत्व है।

सूर्य को अर्ध्य गंगा घाट पर दिया जाता था। खरना के प्रशाद के लिए गंगा नदी का पानी ही प्रयोग में लाया जाता था। मगर हर जगह तो गंगा नदी पहुंच नहीं सकती इसीलिए श्रद्धालुओं ने अन्य नदियों का घाट सजाना शुरू कर दिया। खरना का प्रशाद भी इसी नदी के पानी से बनता है।

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इसी तरह नदियाँ तालाब में बदल गईं तो तालाबों की जगह कुओं ने ले ली, अब तो ये आलम है कि लोग गड्ढा खोद कर या फिर टब में पानी भर कर उसमें खड़े हो कर सूर्य को अर्घ दे देते हैं। और खरना के प्रशाद के लिए जहां पहले गंगा या फिर अन्य नदियों का पानी उपयोग में लाया जाता था वहीं अब नल का पानी प्रयोग किया जाता है।

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आस्था के इस महापर्व छठ में सबसे ज्यादा मान्यता है पवित्रता की। इसी को ध्यान में रखते हुए खरना का प्रशाद तथा ठेकुआ कसार इत्यादि भोग नियमानुसार मिट्टी के नए चूल्हे पर बनाए जाते हैं तथा जलावन के लिए केवल आम की लकड़ी का ही प्रयोग होता है। मगर समय के साथ मिट्टी के चूल्हों से लोग ईंट के चुल्हे व आम लकड़ियों के जलावन से होते हुए नए स्टोव तक पहुंचे और अब आप शहरों में देखें कि लोग व्रत का सारा सामान अपने गैस चूल्हे पर ही बनाते हैं।

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आपको बता दें कि व्रत नियम के अनुसार अर्ध्य या खरना पूजा के समय व्रत करने वाले लोग ऐसा कपडा नहीं पहनते जो सिला हुआ हो। इसके पीछे आम जन की ये धरना है कि जब दर्जी कपड़े सिलते हैं तो धागे को सुई में डालने के लिए पहले उसे मुंह से लगते हैं। इस तरह सिला हुआ वस्त्र जूठा और अपवित्र हो जाता जिसे छठी मईया की पूजा अर्चना के समय नहीं पहना जा सकता। लेकिन समय के साथ साथ ये धारणा अब बदल रही है। शहरों से लेकर गाँवों तक अब लोग सिले कपड़ों के साथ अर्घ देते हैं। वे युवतियां जिनका नया नया विवाह हुआ है वो तो पूरे श्रृंगार के साथ अर्ध्य देती हैं।

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बदलाव का एक और उदहारण है खरना पूजा। छठ व्रत के दूसरे दिन शाम के समय होने वाली पूजा के लिए माना जाता है कि इस समय कान में किसी तरह की आवाज पड़ते ही पूजा टूट जाती है, इसके साथ ही जब व्रती लोग खरना का प्रशाद खाते हैं उस समय अगर उनके कान में किसी तरह की आवाज पड़ जाए तो वो वहीं अपना भोजन छोड़ देते हैं तथा उसके बाद एक निवाला भी नहीं खाते। यही कारण था कि व्रत करने वाले लोग रात को एक पहर बीतने के बाद प्रशाद खाते थे जिस समय उनके कान में कोई शोर न पहुंचे। मगर आज के भीड़ भाड़ और शोरशराबे वाले माहौल में ऐसा भला कहां से संभव है।

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इतना सब बदल जाने के बाद भी अगर कुछ नहीं बदला है तो वो लोगों की इस व्रत के प्रति आस्था। असल मायनों में ये व्रत ही आस्था का है। भले आप नियमों का पूरी तरह पालन न कर पायें, भले कोई खीर, फल आदि का भोग न चढ़ा पाए मगर मन में आस्था हो तो छठी माई जरुर खुश होती हैं।

इसी आस्था से जुडी एक लोक कथा गांव देहात में बहुत प्रचलित है।

किसी गांव में एक गरीब रहता था। वो इतना निर्धन था कि कई बार उसका परिवार भूखे पेट सो जाया करता। छठ व्रत का समय आया तो लोग इसकी तैयारियों में जुट गए लेकिन वो बेचारा भला क्या तैयारी करता उसके पास तो कुछ था ही नहीं। लेकिन वो व्रत करता था। खरना के दिन उसके बच्चों ने कहा कि पिता जी सब लोग आज खीर का नैवेद चढ़ाएंगे, आप भी खीर बना कर नैवेद चढ़ाइए न। वो निर्धन असहाय था।

खीर तो जैसे उसके लिए सपना थी मगर उसे नैवेद तो चढ़ाना ही था। उसे कुछ भी न मिला तो अंत में उसने छठ मैया को सात जगह साग का ही नैवेद चढ़ा दिया। खीर न मिलने पर मायूस बच्चे उदास हो कर सो गए, बच्चों को इस तरह मायूस देख उस निर्धन के मन को भी बहुत तकलीफ हुई मगर वो कुछ कर भी तो नहीं सकता था। इन सबके बीच उसकी आस्था और श्रद्धा में को कमी नहीं थी, उसने जो भी किया था सच्चे मन से ही किया था।

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वो भी बेचारा मायूस हो कर सो गया। जब वो सुबह उठा तो जिन जिन पात पर उसने साग का नैवेद रखा था वो सब हीरे जवाहरात में बदल गए। वो निर्धन रातों रात अमीर हो गया। कथा की शिक्षा यही है कि छठी मईया को सबसे प्रिय है आस्था। ये व्रत अमीर करे गरीब करे लेकिन जो भी करे सच्चे मन और श्रद्धा से करे।

भले ही बदलाव आते जाएं लेकिन श्रद्धा में कमी नहीं आनी चाहिए। आप सबको आस्था के इस महापर्व की हार्दिक शुभकामनाएं ।

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