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और अटल जी के जाने से आज भारत रो पड़ा है !जाने क्यों ?

अटल जी के जाने से आज पूरा भारत ही नही विश्व भी स्तब्ध है

वो कौन-सा तत्व है, जो एक व्यक्ति की प्रतिमा को लोकमानस में यों प्रतिष्ठित कर देता है, जिसे कोई अन्य भरसक प्रयासों के बावजूद अर्जित नहीं कर पाता। इसका उत्तर तो मनुष्य के सामूहिक अवचेतन में संचालित होने वाला रंगमंच ही दे सकता है, जिसकी लिपि कभी पढ़ी नहीं जा सकेगी।

जब हाथ मे अखबार रहा करता था और कलम उनकी ताकत

वर्ष 1996 की बात है। मैं एक हॉकर के रूप में अख़बार बेचने का काम किया करता था और इसीलिए ताज़ा ख़बरों पर त्वरित पाठकीय प्रतिक्रियाओं का संग्राहक बन गया था। स्वदेश, चौथा संसार, नवभारत, नईदुनिया, भास्कर, अवन्तिका, अग्निपथ, ये मेरे झोले में शामिल रहने वाले प्रमुख अख़बार हुआ करते थे।

1996 की ही गर्मियां थीं। एक सुबह उज्जैन के रामबाड़े पर एक व्यक्ति दौड़ता हुआ मेरे पास आया और कहा- आज का अख़बार देना। मैंने अख़बार निकाला। उसने दो रुपए का सिक्का दिया। मैंने कहा- अख़बार एक रुपए का है। उसने लगभग खिलखिलाकर कहा- कोई बात नहीं, दो रुपए ही रख लो।

फिर उसने अख़बार के मुखपृष्ठ को खोलकर अगाध संतोष के साथ उसको निहारा और उसके शीर्षक को धीरे-धीरे पढ़ा- अटल जी प्रधानमंत्री बनेंगे। पहला अटल मंत्रिमंडल कल शपथ लेगा।

अटल छवि ने भारत के मन को मथ दिया

उस अपरिमित संतोष को मैं आज तक भुला नहीं पाया, जो रामबाड़े के उस गोत्रहीन के मुख पर मुझे उस सुबह दिखाई दिया था। अटल जी के प्रधानमंत्री बनने के समाचार भर से उभर आने वाला संतोष। कोई नहीं जानता, वो कौन-सा तत्व है, जो लोकमानस को यों ग्रस लेता है, जैसे अटल-छवि ने भारत के मन को मथ दिया था।

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तेरह दिन बीतते-बीतते वह सब समाप्त हो रहा। नियति में ही यह बदा था कि वज़ीर को प्यादों से पिट जाना था। उन तेरह दिनों में समूचा राष्ट्र दूरदर्शन से चिपका रहा था। चुनाव बुलेटिन और सदन के भाषण बड़े ग़ौर से सुने जाते थे। अंतत: सदन में शक्ति परीक्षण हुआ। खद्दर का पीला कुर्ता पहने अटल जी ने फ़्लोर टेस्ट के दौरान अविस्मरणीय भाषण दिया। वह अपूर्व उद्बोधन आज भी रोमांच से भर देता है।

जब कर्णधार के रूप में चुने गए अटल जी

1950 के दशक के आरम्भ में ही जब श्यामाप्रसाद मुकर्जी ने अटल जी और पं. दीनदयाल उपाध्याय को भारतीय जनसंघ के कर्णधार के रूप में चुन लिया था, तब से, दीवारों पर चढ़कर दिया जलाने के उन अनाम असंज्ञेय दिनों से लेकर आपातकाल, जनता सरकार, इंदिरा वध, राम जन्मभूमि आंदोलन आदि के चालीस साला महासमर से गुज़रकर अंतत: जब राष्ट्र की बागडोर अटल जी के हाथ में आई तो राजनीतिक दुरभिसंधियों के कारण मात्र तेरह दिनों में छिन गई! किंतु इसके बावजूद अटल-व्यक्तित्व के तेज, ओज, गौरव और गाम्भीर्य की रंचमात्र क्षति नहीं हुई थी।

जब अटल जी बोल रहे थे 

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तेरह दिनों के राष्ट्रनायक की खंडित प्रतिमा सदन में खोजे से नहीं दिखाई दी। दिखाई दिए तो अटल जी, जो स्वर में सम्वेदना के अनगिनत आरोह लिए बोल रहे थे और सुनने वालों की हृदयतंत्री उसके साथ साथ कांप रही थी। अंत में अटल जी ने कहा- अध्यक्ष महोदय, मैं अपना त्यागपत्र राष्ट्रपति महोदय को देने जा रहा हूं, और लौटकर जाते अटल जी की पीठ पर दिखाई देने वाले संघर्षों के वर्ष भारतवासियों की चेतना पर उत्कीर्ण हो गए।

तेरह दिन, फिर तेरह माह, तब जाकर लोकतंत्र ने वर्ष 1999 में अटल जी को 303 सीटों का जयमाल पहनाया। देश का सबसे चहेता जननायक पूरे पांच वर्षों के लिए प्रधानमंत्री बना। निश्चय ही, जनसंघ की हुतात्माओं ने तब उनके किरीट पर पुष्पवर्षा की होगी।

लालबहादुर शास्त्री के बाद अटल जी जैसे नेता नही हुआ

भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में लाल बहादुर शास्त्री के बाद से ऐसा कोई दूसरा नेता नहीं हुआ है, जिसने अपने समर्थकों और पार्टीजनों के साथ ही अपने राजनीतिक विरोधियों का भी इतना ही व्यापक सम्मान अर्जित किया हो। अटल जी एक अत्यंत शिष्ट, परिपक्व, संयत और मुखर राजनेता रहे। साठ वर्षों के राजनीतिक जीवन में, जिसमें उन्होंने असंख्य शब्द कहे, एक अभद्र टिप्पणी उनकी आप याद नहीं कर सकते। वे नेहरू का चित्र साउथ ब्लॉक से हटाने पर अफ़सरों को फटकार लगाते हैं, विपक्षी सरकार द्वारा उन्हें अपना दूत बनाकर यूएन में भेजा जाता है और नरेंद्र मोदी को स्पष्ट शब्दों में राजधर्म की सीख देते हैं। उनका छह वर्षों का प्रधानमंत्री कार्यकाल बेदाग़ रहा है। और आज भारतीय राजनीति में भाषायी शुचिता और नैतिक निष्ठा का जिस तरह पतन हो गया है, उसमें अगर किसी एक राजनेता की बारम्बार याद आती है, तो वह अटल बिहारी वाजपेयी ही हैं।

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दुर्भावनापूर्ण तरीक़े से उनके बारे में कहा जाता है कि वे दोयम दर्ज़े के कवि थे। मैं पूछता हूं- छोटे मन से कोई बड़ा नहीं होता, टूटे मन से कोई खड़ा नहीं होता, अगर ये कविता नहीं है तो और क्या है? वाचिक कविता की गीति-परम्परा और छंद-योजना से जो जन अनभिज्ञ हों, वही उनके बारे में वैसी निकृष्ट टिप्पणी कर सकते हैं।

अटल जी बोलेंगे

अटल जी बोलेंगे, अटल जी बोलने वाले हैं, अटल जी भी बोलने के लिए आएंगे, ये छोटे-छोटे वाक्य उनके श्रोताओं को रोमांच से भर देते थे। पलकें मूंदकर, किंचित लम्बे अंतरालों के साथ, नाटकीय स्वराघात से वे एक-एक शब्द पर ज़ोर देकर जब बोलते तो श्रोता सम्मोहित हो जाते। अटल जी बोलते रहें, हम सुनते रहें, एक यही कामना मन में लिए। तब किसे मालूम था कि स्वर-संधान को वैखरी से मध्यमा तक ले जाने वाला विदग्ध वाणी का यह वाग्देवता फिर अनेक वर्षों तक मूक रहकर रीत रहेगा?

न दैन्यम् न पलायनम् , का मंत्रजाप करने वाले अटल जी का जीवन महज़ एक जीवनकाल की सीमाओं के भीतर बाध्य नहीं हो सकता। कवि अज्ञेय ने किरीट-तरु से निर्मित । असाध्य वीणा । का गीत गाया है। किंतु अटलजी भारतीयता का शंखनाद थे। वह पाञ्चजन्य भले अब मौन हो गया हो, अनुगूंजें कभी नहीं मरतीं।

पंडित जवाहरलाल नेहरू की मृत्यु पर राज्यसभा में 29 मई, 1964 को अटल जी ने भावविह्वल होकर जो आदरांजलि दी थी, ठीक वही शब्द आज अटलजी के बारे में दोहराने का मन है

भारतमाता आज शोकमग्न है –

उसका सबसे लाडला राजकुमार सो गया। मानवता आज खिन्नवदना है, उसका पुजारी खो गया। शांति आज अशांत है, उसका रक्षक आज चला गया। जन-जन की आंख का तारा टूट गया। यवनिका पतन हो गया। विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अंतर्धान हो गया… नेता चला गया, अनुयायी रह गए। सूर्य अस्त हो गया, अब तारों की छांव में हमें अपना मार्ग ढूंढ़ना है।

 

अटल जी किताब से 

राघव मिश्रा

About मैं हूँ गोड्डा (कार्यालय)

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