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संवेदनाओं से भरा यह देश निर्भया से लेकर ट्विंकल तक आते आते दो भागों में बंट गया ।

राघव मिश्रा/ फेसबुक पर लिखना छोड़ दीजिए ,क्योंकि उससे ज्यादा आप कुछ कर भी नही सकते हैं ,क्योंकि सुना है वहीं चर्चा है दुष्कर्म और एक बच्ची की निर्मम हत्या की,हाँ तो आज अगर आप दुष्कर्म पर चर्चा करते हैं तो सबसे पहले आपके दिमाग में दिल्ली की 23 वर्षीय बेटी निर्भया का नाम ही आता है । जिस दरिंदगी के साथ निर्भया को नोचा खसोटा और मारने का प्रयास किया गया वो किसी भी पत्थर दिल की आंखों को भिगो देने के लिए काफी था ।

ऐसा नहीं कि इसके बाद ऐसा कुछ हुआ नहीं मगर फिर भी ये घटना सबके ज़हन में आज भी ताज़ा है । इसका कारण जानते हैं ? इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि इस घटना के बाद सारा देश मानों गहरी नींद से जाग कर एक साथ चिल्ला उठा था । हर जगह से निर्भया के लिए न्याय की मांग उठ रही थी । ऐसा कहा जाए तो कहीं से गलत नहीं होगा कि तत्कालीन सरकार की जड़ें उखड़ने के पीछे यह घटना भी बड़ा कारण रही ।

घटना बेहद दुखदाई थी मगर इसके बाद मन को एक संतोष ये हुआ कि ऐसे मुद्दों पर देश ने एक साथ मिल कर आवाज़ उठाना सीख लिया है। दरिंदे रुके नहीं । वे नोचते रहे खसोटते रहे हां लेकिन लोगों की आवाज़ नहीं रुकी । सोशल मीडिया फर्जी शायरियों और गुड मार्निंग, गुड नाईट के पोस्टों से ऊपर उठने लगा । ऐसी घटनाओं पर सरकार से सवाल किए जाने लगे । लगा कि अब चीज़ें बदलेंगीं लेकिन इसी सोशल मीडिया ने जनता का वो रूप भी दिखाया जो उन दरिंदों की दरिंदगी से भी ज़्यादा घिनौना था ।

आवाज़ें बंट गयीं, दुष्कर्म पीड़िताएं किसी के लिए बेटी तो किसी के लिए ‘भाभी’ बन गयीं । कठुआ केस के बाद से तो जैसे मन ही फट गया । समझ आ गयी कि साला अब लोगों की इंसानियत ने भी विशेष जामा ओढ़ लिया है । अब पहले पीड़िताओं के घाव नहीं बल्कि उनका मज़हब और धर्म देखा जाता है । मज़हब और धर्म के कभी एक मायने होते थे मगर अब एक मायने वाले ये दोनों शब्द अपने अपने रंग निर्धारित कर चुके हैं । कठुआ केस के बाद से ही आवाज़ उठाने से पहले देखा जाने लगा कि पीड़िता (भले ही छोटी बच्ची क्यों न हो) कौन से धर्म और मज़हब से है । कठुआ की बच्ची आसिफा के साथ ही गीता का केस भी आया था । एक आधे नहीं बल्कि दर्जनों कमेंट देखे थे जहां 11 साल की गीता को अगवा कर उसके साथ दुष्कर्म किए जाने के बाद उसे ‘भाभी’ कह कर दरिंदों ने अपनी गंदी मानसिकता दिखाई थी ।

इसके बाद से तो खुल कर भेदभाव होने लगा । जो आवाज़ निर्भया के समय एक हुई थी वो अब धर्म के आभार पर बंट गयी । इसका सबसे घिनौना असर ये हुआ कि लोग सिस्टम से यवाल करने की बजाए एक दूसरे को कोसने लग गये ।

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अलीगढ़ की तीन वर्षीय मासूम ट्विंकल का बेरहमी से कत्ल कर दिया गया । रिपोर्ट इतनी भयावह है कि किसी भी बेटी का पिता इसे पढ़ कर अंदर तक हिल जाएगा । घटना के सामने आने पर लोग सोशल मीडिया पर अपना गुस्सा ज़ाहिर कर रहे हैं। एक तरह से बच्ची के लिए न्याय की मांग की जा रही है लेकिन दुखद यह है कि अभी तक जितनी पोस्ट्स आंखों के सामने से गुज़री हैं उनमें से अधिकतर में लोगों ने यही कहा है कि मोमबत्ती गैंग कहां है, अब सब चुप क्यों हैं, ये हिंदू की बेटी है इसलिए सब चुप हैं, ज़्यादातर ऐसी ही पोस्ट्स पढ़ने को मिले हैं । लेकिन मेरा सवाल है कि हमारे लिए अभी ज़रूरी क्या है ? हमारी प्राथमिकता अभी क्या होनी चाहिए ? हमें अभी ट्विंकल के लिए न्याय चाहिए या फिर उन लोगों से जवाब जो चुप हैं ?

क्यों हम इस विरोध में ट्विंकल को नज़रअंदाज़ कर रहे हैं । क्या इस समय सवाल पुलिस प्रशासन या वहां के बड़े नेताओं और अधिकायों से नहीं होने चाहिए । ज़ाहिद और असलम जैसे दरिंदों के हौसले क्यों बुलंद किए जा रहे हैं ? क्यों उन पर से ध्यान भटक रहा है हमारा । क्या इन लोगों को गरियाने से न्याय मिल जाएगा ट्विंकल को ? नहीं दोस्त गलत जा रहे हैं आप । मान लिया कि हर तरफ ज़हर भर चुका है लेकिन ज़हर उगलने का एक समय होता है । अभी समय है न्याय मांगने का ।

मात्र दस हज़ार की उधारी के लिए ऐसी मासूम बच्ची को मार दिया गया जिसकी एक मुस्कुराहट का मोल तक लगाना नामुमकिन था । ऐसे हत्यारों को जितनी सख्त से सख्त सज़ा हो सके मिलनी चाहिए लेकिन इसके लिए आपका आवाज़ उठाना ज़रूरी है । माफ़ी चाहूंगा कि ऐसा कहना पड़ रहा है मगर अभी आप आवाज़ नहीं उठा रहे । यहां न्याय मांगता कोई दिख ही नहीं रहा, सबके सब एक दूसरे को कोस रहे हैं । दूसरों की फिक्र छोड़ दीजिए । वो ख़ुद शर्मिंदा हो जाएंगे और नहीं भी होंगे तो अपना बिगाड़ेंगे क्योंकि भेड़िए भला किसके सगे हुए हैं । आप बस अपना फर्ज़ निभाईए, ट्विंकल के लिए आवाज़ उठाईए ।

ये ज़ाहिद और असलम हर गली नुक्कड़ चौक चौराहों पर घात लगाए बैठे हैं । उन्हें पता है कि ये देश बंटता जा रहा है, हम अपराध कर के बच निकलेंगे और हमारा कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा, ऊपर सब निश्चिंत है ये सोच कर कि सोशल मीडिया का ज़माना है वहीं सब लड़ेंगे और चुप हो जाएंगे । बहन बेटियां सबकी हैं, ज़रूरत भी हम सबकी है । आप सोच लीजिए कि आपको जो चुप हैं उनका फर्जी विरोध चाहिए या ट्विंकल के लिए न्याय ।

इसी के साथ उन जैसों को नमन जो आज भी किसी बच्ची के साथ अन्याय होने पर बिना जाति धर्म देखे आवाज़ उठाते हैं, जिन्हें विरोध से पहले न्याय चाहिए, जो गालियां खा कर भी सच बोल रहे हैं ।

ऐसे उदास मौसमों ने ईश्वर तक को सोचने पर विवश कर दिया है फिर यहां तो वही सरकार और सिस्टम है जो सालों बाद बदलते हैं और हमारे ही दम पर बदलते हैं । आप कुछ नहीं कर सकते लेकिन कम से कम अपनी उदासी, गुस्सा, दुःख तो दिखा ही सकते हैं ।

सब चलता रहेगा । घर में हुई मौत भूल कर घरवाले आगे बढ़ जाते हैं, बढ़ना भी चाहिए इंसान कब तक एक जगह खड़ा रहेगा लेकिन कम से कम एकाध दिन तो अपना दुःख ज़ाहिर कर ही सकते हैं । बहुत दुःख होता है जब किसी संवेदनशील मुद्दे पर लोग एक दो पोस्ट करने के बाद जोक्स या फिर कुछ और पोस्ट करते दिखते हैं । लगता है जैसे सब झूठ पर टिका हुआ है ।

वॉल आपकी है मन आपका है आप जो भी करें हमें क्या परेशानी होगी भला लेकिन आपको आंसू बहाते देखा मैंने फिर कुछ देर बाद ऐसे खिलखिलाने पर बुरा कैसे न लगे । मान लेते कि संवेदनहीन हैं तो कुछ न बोलता, भला पत्थरों से कैसी उम्मीद मगर कुछ समय पहले ही आप फूट फूट कर रोए हैं ।

नकाब पहनना ज़रूरी नहीं है, मन नहीं तो कुछ मत लिखिए, दुःख मत दिखाईए मगर ये दिखावा न कीजिए । विश्वास सा उठने लगता है, हिम्मत टूटने लगती है, दम घुटने लगता है । संवेदनशील दिखने की कोशिश करने से अच्छा है आप संवेदनाहीन ही रहें ।

About मैं हूँ गोड्डा (कार्यालय)

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