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26 साल के बाद भी ब्लड बैंक का सपना नहीं हुआ पूरा

पांच उपायुक्त हो चुक स्थांतरण व दो सिविल सर्जन कर चुके सेवानिवृत्त

छोटा पड़ गया ब्लड बैंक का भवन, व्यवस्थित नहीं हो पा रही मशीनें

गोड्डा डेस्क/ऐसे तो सरकारी भवन बनने के पहले काफी मापदंड और नियमों से गुजरना पड़ता है। जमीन के मिट्टी की जांच से लेकर इंजीनियर के नक्शा बनाने तक।

अगर सदर अस्पताल बनना है तो उसमें सारी सुविधाओं को देखते हुए नक्शा बनाया जाता है, अगर प्रखंड कार्यालय बनना है तो बीडीओ के के कक्ष से लेकर कर्मियों के बैठने के लिए हॉल तक बनाया जाता है।

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लेकिन जिला में रक्त अधिकोष भवन का निर्माण ऐसे हुआ कि आज तीन वर्ष बाद उसमें जब ब्लड बैंक का सामान लगाने का प्रयास हो रहा है तो कर्मी असफल हो जा रहे है। यह और कही नहीं जिला मुख्यालय स्थित सदर अस्पताल परिसर में बने ब्लड बैंक भवन का हाल है।

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यह सरकार और प्रशासन की बेरूखी ही कहा जाए कि भवन बनने के लिए तीन वर्ष बाद यहां पर सुविधाएं शुरू करने के प्रयास किए जा रहे है। इसके लिए विभाग ने ब्लड बैंक के विशेषज्ञ तकनीशियन विश्वनाथ बख्शी का पदस्थापन देवघर से गोड्डा में किया गया है।

लेकिन विगत पांच माह में मात्र अब तक लाइसेंस लेने की प्रक्रिया के प्रथम चरण पूरे हुए है। अगर यही हाल रहा तो जिलेवासियों को ब्लड बैंक के सुविधा के लिए अगले वर्ष तक इंतजार करना पड़ सकता है।

मशीनें नहीं हो रही व्यवस्थित, कर्मी परेशान :

ब्लड बैंक में लगायी जाने वाले आधुनिक मशीनें भवन के हॉल और गेट पर रखी गयी है। हाल यह है कि ये मशीनें भवन में व्यवस्थित नहीं हो पा रही है।

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कारण जानने की कोशिश की गयी तो पता चला कि भवन को जितना बड़ा बनाया जाना था उतना बना नहीं। जानकारों की माने तो ब्लड बैंक भवन के मापदंड के अनुसार उसकी लंबाई चौड़ाई 1000 से 1100 स्कवायर फीट होनी चाहिए।

 

लेकिन जब लाइसेंस अप्लाई के लिए भवन की लंबाई चौड़ाई मापी गयी तो 915 स्कवायर फीट आया। जिससे पता चला कि भवन मापदंड के अनुसार छोटा बनाया गया है।

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वर्तमान में ब्लड बैंक में उपयोग में लायी जाने वाली मशीनों में आधा समान आ चुका है। इसमें डोनल कॉच दो पीस, रेफ्रीजेरेटर डॉमेस्टिक दो पीस, ब्लड रेफ्रीजेरेटर दो पीस, वाटर बाथ दो पीस, मिक्सचर दो पीस व एलेजा रिडर दो पीस रखा हुआ है। ये मशीनें भवन में चिन्हित जगहों में नहीं जा पा रही है।

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इसका मुख्य कारण है कि दरवाजे का साइज छोटा है और मशीनें दरवाजे से बड़ी है। अधिकांश मशीनें परिसर में रखी गयी है। कर्मियों का कहना है कि दीवारों को काटने के बाद ही मशीनें ठीक जगह पर व्यवस्थित हो पाएंगी।

लाइसेंस मिलने पर छा सकते है संकट के बादल :

ब्लड बैंक के लाइसेंस लेने के विभाग के लिए टेढ़ी खीर साबित हो सकती है। इंजीनियर के इस गलती के कारण लाइसेंस मिलने की संभावना काफी कम ही दिख रही है।

 

जानकारों की माने तो ब्लड बैंक के लिए लाइसेंस लेने के लिए कई स्टेपों से गुजरना पड़ता है। इसमें सर्वप्रथम औषधि निरीक्षक ब्लड बैंक का निरीक्षण कर भवन की स्थिति की रिपोर्ट स्टेट टीम को समर्पित करते है। इसके बाद स्टेट से गठित टीम का भवन का सर्वेक्षण करतीं है।

 

अगर पूरा स्थिति ठीक ठाक रही तो स्टेट इस रिपोर्ट को सेंट्रल को सौंपती है। जिसके बाद केन्द्र की भी टीम निरीक्षण करने के बाद लाइसेंस जारी करती है। लेकिन भवन के अद्यतन स्थिति ही काफी खराब है। जिसके कारण लाइसेंस मिलने पर संकट के बादल छा सकते है।

26 साल का असफल प्रयास :

अगर जिले में ब्लड बैंक बनाने की बात करें तो यह प्रयास वर्ष 1992 में एकीकृत बिहार के तत्कालीन राज्य मंत्री श्री फैयाज भागलपुरी ने सदर अस्पताल परिसर में नींव रखी थी। यह रक्त अधिकोष भवन कुछ दिन तक लोगों को सुविधाएं भी दी।

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लेकिन समय बीतने के साथ यह सुविधा सिस्टम की भेंट चढ़ गया। यहां पर किसी विशेषज्ञ का पदस्थापन नहीं होने के कारण मशीनें बर्बाद हो गयी। इसके बाद झारखंड अगल हुआ।

 

दूसरी बार गृह जिला के ही बरहेट के पूर्व विधायक हेमलाल मुर्मू स्वास्थ्य मंत्री बने। इनके कार्यकाल के दौरान जिला मुख्यालय में ही जगह चिन्हित कर ब्लड बैंक का शिलान्यास किया गया। लेकिन जमीन के विवाद के कारण ठंडे बस्ते में चला गया।

 

फिर जाकर 2015 में पहली बार विधायक बने दिवंगत रघुनंदन मंडल ने ब्लड बैंक के लिए पहल शुरू की। जिसके बाद भवन का निर्माण शुरू हो चुका। लेकिन इसी बीच उनका आकस्मिक निधन हो गया। भवन बनने के बाद दो सिविल सर्जन सेवानिवृत्त तक हो चुके है। इसमें एक डॉ प्रवीण राम व दूसरी डॉ बनदेवी झा शामिल है। इसके बावजूद ब्लड बैंक चालू नहीं हो पाया ये दुर्भाग्य है गोड्डा का ।

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